Tag: अधर्म
अधर्म
वो क्रियायें जिन्हें करते करते ऊब जायें, फ़िर चाहे वे क्रियीयें धार्मिक ही क्यों ना हों । मुनि श्री सुधासागर जी
धर्म/अधर्म
अधर्म तनाव पैदा करता है, धर्म नाव बनकर भवसागर पार करा देता है ।
धर्म/अधर्म
धर्म जब आरामतलबी की ओर बढ़ने लगता है, तब अधर्म की ओर मुँह कर लेता है । चिंतन
धर्म/अधर्म
अधर्म = बदला लेना, धर्म = अपने आपको बदल लेना । आर्यिका श्री पूर्णमती माताजी
बेईमानी/अधर्म
हम ईमानदारी निभा नहीं पाते, सो ईमानदारी की परिभाषा ही अपने अपने अनुसार बदल लेते हैं । धर्मानुसार चल नहीं पाते, सो धर्म का रूप
धर्म
धर्म के बारे में सोचा नहीं जाता, बस अधर्म कम करते चले जाओ, धर्म स्वंय जीवन में आता जायेगा । अधर्म का अभाव ही धर्म
भोग/धर्म
यदि भोगना ही है तो धर्म करते हुये भोगो । जैसे वृक्ष के फल तोड़कर खाना – धर्म, वृक्ष काटकर फल खाना – अधर्म ।
धर्म
धर्म की पहचान, अधर्म पहचानने से होगी । अधर्म कम करते जाओ, जीवन में धर्म आता जायेगा । अधर्म किसके लिये ? शरीर के लिये
Recent Comments