Posted by admin on April 30, 2010 at 6:37 am
माँ काम करते समय बच्चे को दूर रखने के लिये खिलौना दे देती है, वह मग्न हो जाता है ।
वैभव भी खिलौना है, जिसे मिला वह प्राय: जिनवाणी माँ से अलग हो जाता है ।
जब माँ पास बुलाना चाहती है तो खिलौना छीन लेती है, गोदी में ले लेती है ।
वैभव छिनने पर यही सोचें कि जिनवाणी माँ अपने पास बुला रही है ।
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Posted by admin on April 29, 2010 at 12:06 am
जीवन में सफल होने के लिये 3 Factory जरूरी हैं ।
तब होगी Life Satisfactory ।
(श्री संजय)
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Posted by admin on April 28, 2010 at 2:17 am
Care should be in heart, not in words;
Anger should be in words, not in heart.
(Mr. Sanjay)
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Posted by admin on April 27, 2010 at 11:38 pm
जाप, पूजा आदि बैठकर या ख़ड़े होकर करने के लिये क्यों कहा है ?
बैठने से 90 Degree का Angle बनता है, लेटने से 0 Degree का ।
यदि हम अपना ध्यान / Efficiency 90% (100% जो आजकल हो नहीं सकती ) रखना चाहते हैं तो बैठकर या ख़ड़े होकर करें ।
Archived under चिंतन
Posted by admin on April 26, 2010 at 1:48 am
दीप से दीप जलता है, तो उजाला होता है ।
आदमी से आदमी जलता है, तो अंधियारा होता है ।
( निधि ग्वालियर)
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Posted by admin on April 25, 2010 at 11:47 pm
खट्टे दही ( विपरीत परिस्थिति ) के लगातार मंथन से भी नवनीत निकलता है ।
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Posted by admin on April 24, 2010 at 2:31 am
गप्पी दो घर बिगाड़ता है, श्रोता दो घर बनाता है ।
अपना धर्म श्रवण कर उद्धार करता है और वक्ता को साता देता है ।
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Posted by admin on April 23, 2010 at 1:55 am
धर्म की राह पर प्रगति करना चाहते हो ?
- यदि नहीं, तो बात खत्म ।
- यदि हाँ, तो -
- Admit करें की आपमें कमजोरियाँ हैं ।
- उनकी List बनायें ।
- किसी गुरू की तलाश शुरू करें ।
गुरू -
A – जो श्रद्धा, ज्ञान, चारित्र में आपसे श्रेष्ठ हों ।
B – जो आपको समय दे सकें ।
- उन्हें Weaknesses की List बताकर उन्हें दूर करने के उपाय के बारे में Discuss करें ।
- अभ्यास करें । गिरेंगे, गिरने से सीख लें, उठें, फिर चलें ।
- गुरू को Regularly Visit करें, उनके Touch में रहें । उन्हें बतायें – क्यों गिरे, क्या सीखा, प्रायश्चित लें ।
- धार्मिक और ईमानदार लोगों की संगति रखें ।
मोक्षमार्ग प्रशस्त होगा ।
Archived under चिंतन
Posted by admin on April 22, 2010 at 7:23 am
अति ( Excess ) के बिना इति ( Goal ) से साक्षात्कार करना संभव नहीं,
पीड़ा की अति ही, पीड़ा की इति है,
पीड़ा की इति ही, सुख का अर्थ है,
पीड़ा को सहना ही, वास्तविक और सात्विक सुख है ।
Archived under वचनामृत-आचार्य श्री विद्यासागर
Posted by admin on April 21, 2010 at 5:36 am
रिश्ते और रास्ते एक सिक्के के दो पहलू हैं,
कभी रिश्ते निभाते निभाते रास्ते बदल जाते हैं,
कभी रास्ते पर चलते चलते रिश्ते बन जाते हैं ।
(उदया)
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