Archive for April, 2010

वैभव

माँ काम करते समय बच्चे को दूर रखने के लिये खिलौना दे देती है, वह मग्न हो जाता है ।
वैभव भी खिलौना है, जिसे मिला वह प्राय: जिनवाणी माँ से अलग हो जाता है ।
जब माँ पास बुलाना चाहती है तो खिलौना छीन लेती है, गोदी में ले लेती है ।

वैभव छिनने पर यही सोचें कि जिनवाणी माँ अपने पास बुला रही है ।

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Satisfaction

जीवन में सफल होने के लिये 3 Factory जरूरी हैं ।

  • Brain में Ice Factory
  • ज़ुबान में Sugar Factory
  • Heart में Love Factory

तब होगी Life Satisfactory

(श्री संजय)

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Care/Anger

Care should be in heart, not in words;
Anger should be in words, not in heart.

(Mr. Sanjay)

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जाप/पूजा

जाप, पूजा आदि बैठकर या ख़ड़े होकर करने के लिये क्यों कहा है ?
बैठने से 90 Degree का Angle बनता है, लेटने से 0 Degree का ।
यदि हम अपना ध्यान / Efficiency 90% (100% जो आजकल हो नहीं सकती ) रखना चाहते हैं तो बैठकर या ख़ड़े होकर करें ।

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ईर्ष्या

दीप से दीप जलता है, तो उजाला होता है ।
आदमी से आदमी जलता है, तो अंधियारा होता है ।

( निधि ग्वालियर)

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विपरीत परिस्थिति

खट्टे दही ( विपरीत परिस्थिति ) के लगातार मंथन से भी नवनीत निकलता है ।

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श्रोता

गप्पी दो घर बिगाड़ता है, श्रोता दो घर बनाता है ।

अपना धर्म श्रवण कर उद्धार करता है और वक्ता को साता देता है ।

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धर्म की राह पर प्रगति

धर्म की राह पर प्रगति करना चाहते हो ?

  • यदि नहीं, तो बात खत्म ।
  • यदि हाँ, तो -
  1. Admit करें की आपमें कमजोरियाँ हैं ।
  2. उनकी List बनायें ।
  3. किसी गुरू की तलाश शुरू करें ।
    गुरू -
    A – जो श्रद्धा, ज्ञान, चारित्र में आपसे श्रेष्ठ हों ।
    B – जो आपको समय दे सकें ।
  4. उन्हें Weaknesses की  List बताकर उन्हें दूर करने के उपाय के बारे में  Discuss करें ।
  5. अभ्यास करें । गिरेंगे, गिरने से सीख लें, उठें, फिर चलें ।
  6. गुरू को Regularly Visit करें, उनके Touch में रहें । उन्हें बतायें – क्यों गिरे, क्या सीखा, प्रायश्चित लें ।
  7. धार्मिक और ईमानदार लोगों की संगति रखें ।

मोक्षमार्ग प्रशस्त होगा ।

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सुख

अति ( Excess ) के बिना इति ( Goal ) से साक्षात्कार करना संभव नहीं,
पीड़ा की अति ही, पीड़ा की इति है,
पीड़ा की इति ही, सुख का अर्थ है,
पीड़ा को सहना ही, वास्तविक और सात्विक सुख है ।

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रिश्ते/रास्ते

रिश्ते और रास्ते एक सिक्के के दो पहलू हैं,
कभी रिश्ते निभाते निभाते रास्ते बदल जाते हैं,
कभी रास्ते पर चलते चलते रिश्ते बन जाते हैं ।

(उदया)

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