वचनामृत - अन्य

होनी/ अनहोनी

होनी और अनहोनी तो टलती नहीं ?

उस समय अपना विवेक प्रयोग करें ।

मुनि श्री विद्याभूषण जी

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आचरण

आचरण = आ + चरण छुओ

मुनि श्री योगसागर जी

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ज्ञाता-द्रष्टा

एक किसान रोजाना अपनी पत्नी को पीटता था,
गुरू ने कहा – ज्ञाता द्रष्टा बन जाओ,
इस तरकीब से किसान पत्नी को पीट नहीं पाता था । किसान परेशान रहने लगा और एक दिन उसने तरकीब लगाई कि हल में एक बैल को तो एक तरफ़ से लगाया और दूसरे को दूसरी तरफ़ लगा कर खेत जोतने लगा ।
पत्नी ने देखा और ज्ञाता द्रष्टा का मंत्र याद कर कुछ नहीं बोली और किसान उसकी पिटाई नहीं कर पाया ।

यदि ज्ञाता द्रष्टा बने तो कर्म हमारी पिटाई नहीं कर पायेंगे ।

पं. रतनलाल जी इन्दौर

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भक्त

वक्त पर जो भक्त बनता है, वो विभक्त होता है ।

मुनि श्री योगसागर जी

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मौन

मौन रखना भी सत्य बोलना है – कम से कम खाते समय तो मौन रहें।

मुनि श्री आर्जवसागर जी

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आत्मबल

आज कल आत्मा दुर्बल होती जा रही है,
क्योंकि उसका भोजन उसे नहीं मिल रहा है ।

श्री गणेश वर्णी जी

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गुरू

गुरू आदेश नहीं, निर्देश देते हैं ।

मुनि श्री वीरसागर जी

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पुरूषार्थ/कर्मोदय

पुरूषार्थ = Doing/ करना ।
कर्मोदय = Being/ हो जाना ।

आचार्य श्री महाप्रज्ञ जी

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समता

मुर्दा ड़ूबता नहीं, ड़ूबता तो ज़िंदा ही है ।
क्योंकि मुर्दा के समता भाव है और ज़िंदा छटपटाता है, अहंकारी है और कर्ता की भावना रखता है, इसलिये ड़ूब जाता है |

मुनि श्री मंगलानंद जी

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दुःख

एक आदमी बस में गंदी सीट पर बैठा और पीठ में दर्द कर लिया ।
घर आने पर उसको पूछा – आपने अपनी सीट किसी से बदल क्यों नहीं ली ?
वह बोला – बस में कोई था ही नहीं, बदलता किससे !

मुनि श्री वैराग्यसागर जी

दुःख के लिये रोते तो हैं पर उसे दूर करने का उपाय नहीं करते, जबकि उपाय Available हैं |

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