Posted by admin on May 31, 2012 at 11:08 AM ·
मन :-
द्रव्य मन शरीर नाम कर्म के उदय से बनता है, तब भाव मन कर्मों के क्षयोपशम से ।
अच्छे बुरे भाव आते रहते हैं ।
चिंतन
Posted by admin on May 29, 2012 at 01:40 PM ·
परिक्रमा :-
परिक्रमा क्यों करते हैं ?
मंदिर समवसरण का रूप होता है,
समवसरण में भगवान चारों ओर से दिखते हैं ।
Posted by admin on May 28, 2012 at 10:55 AM ·
द्रव्य संग्रह :-
द्रव्य संग्रह 800 – 900 वर्ष पूर्व आचार्य श्री नेमीचन्द्र द्वारा केशवरायपाटन में लिखा गया था ।
इसका नाम छ: द्रव्यों के संग्रह से पड़ा ।
इसमें 58 गाथायें प्राकृत में हैं, जिनमें से पहली 14 गाथायें आत्मचिंतन के लिये बहुत उपयोगी हैं ।
Posted by admin on May 23, 2012 at 11:40 AM ·
निर्वाण/सिद्ध क्षेत्र :-
निर्वाण और सिद्ध क्षेत्र का प्रभाव/नाम पंचमकाल के अंत तक ही चलता है ।
पं रतनलाल बैनाड़ा जी
Posted by admin on May 21, 2012 at 11:35 AM ·
मुमुक्षु :-
मुक्ति की इच्छा रखने वाले को मुमुक्षु कहते हैं ।
Posted by admin on May 18, 2012 at 11:46 AM ·
पर्याप्ति :-
शक्ति की प्राप्ति को पर्याप्ति कहते हैं ।
Posted by admin on May 17, 2012 at 10:42 AM ·
व्यवहार/निश्चय :-
निश्चय से व्यवहार चारित्र भी होगा क्योंकि निश्चय पर ज्यादा टिका नहीं जा सकता,
तब व्यवहार चारित्र पर ही आना होगा,
जैसे व्यवहार से निश्चय चारित्र होता है ।
कुंदकुंद का कुंदन
Posted by admin on May 16, 2012 at 11:21 AM ·
ध्यान :-
गृहस्थ के ध्यान नहीं, ध्यान की भावना हो सकती है, ध्यानाभास हो सकता है ।
Posted by admin on May 11, 2012 at 11:10 AM ·
कारण/करण :-
कारण से कार्य हो या न हो,
पर करण से अवश्य होता है ।
पं रतनलाल बैनाड़ा जी
Posted by admin on May 10, 2012 at 11:33 AM ·
कल्पी/उपकल्पी :-
अवसर्पणी के पंचमकाल में हर 500 वर्ष बाद एक उपकल्पी तथा 1000 वर्ष बाद एक कल्पी होता है ।
जो मुनियों पर tax के रूप में ग्रास लेकर उपसर्ग करने पर असुर देवों के द्वारा मार दिये जाते हैं और नरक जाते हैं ।
पं. मुख्तार जी – 569
Posted by admin on May 08, 2012 at 10:33 AM ·
मिथ्यात्व :-
ज्ञान software है, मिथ्यात्व virus है ।
एक बार थोड़ा सा घुस आये तो पूरे ज्ञान को corrupt कर देता है ।
चिंतन
Posted by admin on May 04, 2012 at 12:09 PM ·
पांड़ुक शिला :-
5 मेरू पर 20 (5×4 पांड़ुक शिलाएं हैं)
ये चंद्राकार होती हैं ।
पं. मुख्तार जी – 567
Posted by admin on May 03, 2012 at 11:09 AM ·
चंद्रग्रहण :-
चंद्रग्रहण के समय सूतक नहीं मानते, उस समय पूजादि का निषेध भी नहीं है ।
क्योंकि ग्रहण तो चंद्रमा के आगे राहू के आने से ( दिखना रूकने से) होता है ।
श्री तिलोयपण्णत्ति – 7/205 ( पं. मुख्तार जी – 566)
Posted by admin on May 01, 2012 at 12:26 pm ·
संहनन :-
कर्मभूमियों की स्त्रियों के अंतिम तीन संहनन होते हैं ।
चक्रवर्ती की पटरानी तथा भोगभूमियों में इनके व्रजव्रषभनाराच संहनन होता है ।
पं. रतनलाल बैनाड़ा जी