Posted by admin on January 31, 2012 at 09:39 am ·

गंधकुटी :-

सामान्य केवली के गंधकुटी होती है ।
अंत:कृत (उपसर्ग के बाद केवलज्ञान और फौरन मोक्ष ) और मूक केवली के नहीं होती ।

पं रतनलाल बैनाड़ा जी

Posted by admin on January 30, 2012 at 12:14 pm ·

गणधर :-
मुनि समूह के स्वामी तथा जो भगवान की वाणी को सबसे ज्यादा समझ सकें वे गणधर होते हैं ।
ये 63 ऋद्धियों ( केवलज्ञान को छोड़कर, बाकि सब) के स्वामी होते हैं, तभी तो बिना आहार, निहार के हजारों सालों तक भगवान के पास ही रहते हैं ।

पं रतनलाल बैनाड़ा जी

Posted by admin on January 27, 2012 at 00:02 am ·

रागी देव :-

यदि राजा के सामने उनके सेवकों की पूजा करोगे तो क्या सेवक खुश होंगे ?

वीतराग भगवान के रहते रागी देवों की पूजा करने से, वे खुद पलायन कर जायेंगे ।

मुनि श्री सुधासागर जी

Posted by admin on January 25, 2012 at 12:02 pm ·

द्रव्य/भाव :-

 

 

द्रव्य बिना भाव के रह सकता है,

लेकिन भाव बिना द्रव्य के नहीं रह सकता ।

Posted by admin on January 24, 2012 at 11:04 am ·

तीर्थंकर और कामदेव :-

तीर्थंकर कभी बूढ़े नहीं होते,

कामदेव के बुढ़ापा आता है, उनके झुर्रियाँ पड़तीं हैं ।

पं. रतनलाल बैनाड़ा जी

Posted by admin on January 20, 2012 at 10:40 am ·

 

 

गुणस्थान :-

गुणस्थान में पिता कौन ?

पहला गुणस्थान, क्योंकि बाकी सारे गुणस्थान इसी से पैदा होते हैं ।

मुनि श्री ब्रम्हानंदी जी

Posted by admin on January 19, 2012 at 10:48 am ·

 

 

संयास :-

घर से निकल ( नि=निकल, कल=शरीर ),

‘निकल’ (सिद्ध) तभी बनोगे,

अशरीरी तभी बन पाओगे ।

आर्यिका श्री पूर्णमति माताजी

Posted by admin on January 18, 2012 at 10:47 am ·

नय/निक्षेप :-

नय ज्ञान के भेद हैं ।

निक्षेप उस ज्ञान के अनुसार किये गये व्यवहार को कहते हैं ।

नय ज्ञान है, निक्षेप ज्ञेय है ।

Posted by admin on January 16, 2012 at 10:51 am ·

 

 

संहनन :-

शुक्ल ध्यान के लिये तीन शुभ संहनन चाहिए ।

क्षपक श्रेणी के लिये वज्रवृषभनाराच संहनन ही चाहिए ।

पं. रतनलाल बैनाड़ा जी

Posted by admin on January 09, 2012 at 03:55 pm ·

 

 

नाम कर्म :-

शरीर नाम कर्म के उदय से योग होता है,

तथा शरीर की रचना होती है ।

श्री रतनचन्द्र जी मुख्तार जी – 444

Posted by admin on January 06, 2012 at 02:35 pm ·

शुभोपयोग :-

शुभोपयोग को भी संवर और निर्जरा का कारण कहा है ।

आचार्य श्री विद्यासागर जी – प्रवचनपर्व – 5

Posted by admin on January 05, 2012 at 11:34 am ·

 

 

अवतरित :-

जैन सिद्धांत में अवतार नहीं होते,

कोई भी जीव अवतरित हो सकता है ।

आचार्य श्री विशुद्धसागर जी

Posted by admin on January 03, 2012 at 10:25 am ·

अज्ञान :-

अज्ञान दो प्रकार का –

1. पुण्यों के अभाव से ।

2. मिथ्यात्व के साथ क्षयोपशम से ।

Posted by admin on January 01, 2012 at 09:20 am ·

तत्व:-

7 तत्वों में 2 हेय हैं (आश्रव तथा बंध),

2 उपादेय हैं (संवर तथा निर्जरा),

और मोक्ष जीवन का लक्ष्य है ।

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