Posted by admin on October 26, 2011 at 00:20 am ·

दीपावली :-

महावीर भगवान के मोक्ष जाने तथा शाम को गौतमस्वामी के केवलज्ञान होने के उपलक्ष्य में दीपावली मनाई जाती है ।
दीपावली मनाने का सबसे प्राचीन ( 2200 – 2300 वर्ष पहले ) हरिवंश पुराण में प्रमाण मिलता है ।
यह ज्ञान और निर्वाण के उत्सव का पर्व दीपों को प्रकाशित करके मनाया जाता है ।

Posted by admin on October 24, 2011 at 12:20 am ·

धनतेरस :-

धनतेरस को जैन आगम में धन्य तेरस या ध्यान तेरस भी कहते हैं । भगवान महावीर इस दिन तीसरे और चौथे ध्यान में जाने के लिये योग निरोध के लिये चले गये थे। तीन दिन के ध्यान के बाद योग निरोध करते हुये दीपावली के दिन निर्वाण को प्राप्त हुये । तभी से यह दिन धन्य तेरस के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

मुनि श्री क्षमासागर जी/पं. रतनलाल बैनाडा जी

Posted by admin on October 19, 2011 at 11:31 am ·

देवदर्शन :-

आचार्य शांतिसागर जी महाराज मंदिर जी में विराजमान थे, एक व्यक्त्ति ने उनको नमोस्तु नहीं कहा, सीधा भगवान के दर्शन करने चला गया । लौटकर आचार्य श्री को नमोस्तु कहा ।
आचार्य श्री ने उसे विशेष आर्शीवाद दिया ।

Posted by admin on October 15, 2011 at 11:55 am ·

श्रमण :-

श्रमण के साथ रहने से वीर रस आ जाता है ।

आचार्य श्री विद्यासागर जी

(साधुजनों के पास जाकर संयम लेने की भावना का आना, वीर रस ही तो है)
Posted by admin on October 06, 2011 at 01:17 pm ·

दशहरा पर्व :-

दशहरा दस कमजोरियों ( क्रोध, मान, माया, लोभ, असत्य, असंयम आदि ) पर धर्म की विजय का प्रतीक पर्व है ।

चिंतन – श्रीमति सीमा जैन- मुंबई

Posted by admin on October 05, 2011 at 10:27 am ·

पाणि-पात्र :-

पात्र से पानी पीने वाला, उत्तम पात्र हो ही नहीं सकता ।
पाणी-पात्र ही परमोत्तम है,
पात्र भी परिग्रह है ना ।

आचार्य श्री विद्यासागर जी (मूकमाटी)

Posted by admin on October 04, 2011 at 11:08 am ·

सम्यक्चारित्र :-

कर्मों को जलाने के लिये सम्यक्चारित्र दावानल है ।
जब तक घर में हैं, मोह और लोभ कम करें ।

आचार्य श्री विद्यासागर जी

Posted by admin on October 01, 2011 at 10:45 am ·

अभिषेक :-

पार्श्वनाथ भगवान की मूर्ति पर अभिषेक सर्प के ऊपर से नहीं करना चाहिये ।

पं श्री रतनलाल बैनाड़ा जी

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