Posted by admin on May 30, 2011 at 11:20 am ·

आसादना :-

यानि रूकावट जैसे धर्म क्रियायों में आसादना होना ।

पं. रतनलाल बैनाड़ा जी

Posted by admin on May 29, 2011 at 11:27 am ·

Shikhar Ji :-

Long awaited discussion on railway line for Shikhar Ji via Parasnath station has been approved by Govt. and work for the same will start soon.

Jain Info

Posted by admin on May 27, 2011 at 09:08 am ·

ज्ञाता द्रष्टा :-

आप तो कुछ होने से पहले ही देख लेना चाहते हो ।
पर भूल जाते हो कि वस्तु का परिणमन जिस समय, जिस रूप में होता है, बस उसी को देखा जा सकता है ।
वस्तु के वर्तमान परिणमन को ध्येय और ज्ञेय बनाओ तो कोई भी चीज अभीष्ट नहीं रह जायेगी ।

आचार्य श्री विद्यासागर जी ( प्रवचन प्रमेय )

Posted by admin on May 26, 2011 at 11:22 am ·

सम्यग्दर्शन/सम्यग्ज्ञान/सम्यक्चारित्र :-

किसी ऐसी जगह जाना हो जहाँ पहले आप कभी गये ना हों और आप उस जगह के बारे में जानते ना हों ।
तो क्या करेंगे ?
किसी विश्वास वाले व्यक्ति से, जो उस जगह के बारे में जानता हो, उस रास्ते पर हमसे आगे हो, उस पर विश्वास करके उससे पूँछते हैं ।
फिर उसके बताये हुये रास्ते को ज्ञान में लेंगे ।
अंत में उस रास्ते पर खुद ही चलना होगा, तभी गंतव्य पर पहुँच पायेंगे ।
यही तो सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चारित्र है ।

चिंतन

Posted by admin on May 24, 2011 at 11:46 am ·

सामायिक :-

समभाव परिणाम ही सामायिक है ।

रत्नत्रय -2

Posted by admin on May 23, 2011 at 11:04 am ·

कर्मबंध/निर्जरा :-

जैसे रस ले ले कर हमने कर्म बांधे हैं,
ऐसे ही रस ले ले कर हम कर्म काटते क्यों नहीं ?
( कर्म काटने का रस संयमियों/मुनियों के जीवन में देखें । )

आचार्य श्री विद्यासागर जी

Posted by admin on May 20, 2011 at 10:47 am ·

स्थावर जीव :-

वनस्पतिकायिक के अलावा स्थावर जीव आँखों से दिख नहीं सकते । जो दिखते हैं वे सब त्रस जीव ही होते हैं ।
सड़ने से अमर्यादित भोजन में त्रस जीव ही पैदा होते हैं ।
देशव्रती के लिये त्रस जीव ही अभक्ष्य हैं ।

आचार्य श्री विद्यासागर जी

Posted by admin on May 19, 2011 at 02:59 pm ·

क्रमवर्ती/क्रमबद्ध पर्याय :-

क्रमबद्ध पर्याय – बचपन, युवावस्था, बुढ़ापा, क्रमवार आना ।
क्रमवर्ती पर्याय – बचपन के बाद किसी बीमारी की वजह से बुढ़ापा आ जाना ।

जैसे जाना है ग्वालियर से दिल्ली –

स्टेशनों का क्रम से आना – क्रमबद्ध पर्याय
किसी अन्य route से दिल्ली पहुँचना – क्रमवर्ती पर्याय

Posted by admin on May 17, 2011 at 11:29 am ·

अन्यत्व :-

शरीर और आत्मा एक क्षेत्रावगाही होते हुए भी अन्य हैं,
तो ये बाह्य पदार्थ जो clearly अलग दिख रहे हैं, वे मेरे कैसे हो सकते हैं !

रत्नत्रय -२

Posted by admin on May 13, 2011 at 11:29 pm ·

आदत :-

निगोदियाओं की तरह नारकियों तथा अन्य पर्याय में भी वेदना की आदत पड़ जाती है ।
सबसे ज्यादा दु:ख शुरू में होता है ।
सुख भी पहले पहले ही ज्यादा लगता है, चाहे Promotion हो, पुत्र प्राप्ति या कुछ और ।
( जेल में एक जानकार Bail ही नहीं ले रहे, कहते हैं – अब तो सब Adjust हो गया है । )

पं. रतनलाल जी बैनाड़ा

Posted by admin on May 12, 2011 at 11:12 pm ·

विजयार्द्ध पर्वत :-

विजयार्द्ध पर्वत चक्रवर्ती के विजय की आधी सीमा निर्धारित करता है।
यह हर भरत/ऐरावत और विदेह के प्रत्येक देश (32×5=160) में एक-एक होते हैं। इस तरह कुल 170 विजयार्द्ध पर्वत हैं।

Posted by admin on May 10, 2011 at 12:15 pm ·

मन:पर्यय ज्ञान :-

ईहा – मतिज्ञान पूर्वक स्वंय तथा दूसरे के मन में स्थिति विचारों एवं पदार्थों को जाना जाता है । फिर मन:पर्यय ज्ञान से उन विचारों के details को जानते हैं ।

पं. रतनलाल जी बैनाड़ा

Posted by admin on May 09, 2011 at 11:24 am ·

आर्जव :-

आचार्य श्री विद्यासागर जी

Posted by admin on May 06, 2011 at 11:30 am ·

देशावधि ज्ञान :-

सर्वार्थसिद्धि के अनुसार – देशावधि के छ: भेद हैं ।
अनुगामी, अननुगामी, वर्धमान, हीयमान, अवस्थित और अनवस्थित ।
राजवार्तिककार ने दो भेद और बढ़ाकर आठ कर दिये –
प्रतिघाती ( छूटने वाला) तथा अप्रतिघाती ।

जिज्ञासा समाधान – 137

Posted by admin on May 03, 2011 at 12:09 pm ·

तप :-

ज्वार के बीज पूरा पके होने पर खराब नहीं होते,कीडे़ नहीं लगते ।
दूध तप कर जब घी बनता है, तब वह हमेशा ऊपर ही रहता है, सुगन्ध देता है, प्रकाश देने में निमित्त बनता है ।
तप से झुलसने से ड़रते हो, विषयों से जलते हुये भी नहीं ड़रते ?
तप से सुख /शान्ति मिलती है, सुख /शान्ति से तप और बढ़ता है,
विषयों से दुःख/अशान्ति मिलती है, दुःख/ अशान्ति से हम और विषयों में डूबते हैं ।

आचार्य श्री विद्यासागर जी

Posted by admin on May 02, 2011 at 12:04 pm ·

संयम  :-

आचार्य श्री विद्यासागर जी

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