Posted by admin on March 30, 2011 at 03:42 pm ·

कल्पवृक्ष :-

एक अपेक्षा से देखा जाये तो कल्पवृक्ष स्वर्ग में नहीं, नरक में होने चाहिये।

एक राहगीर थककर एक पेड़ के नीचे बैठ गया, इच्छा करने लगा-ठंड़ा पानी मिल जाये, ठंड़ा पानी हवा में आ गया ।
फिर इच्छा बढ़ी – भोजन मिल जाये, हवा में भोजन आ गया । इसी तरह पलंग भी आया और उस पर वो सो गया, जब आँख खुली तो मन में विचार आया –
ये सब हुआ कैसे ?
कहीं इस पेड़ पर कोई राक्षस तो नहीं रहता, तब राक्षस आ गया और उस राहगीर को खा गया।
क्योंकि वह कल्पवृक्ष के नीचे बैठा हुआ था और जो इच्छा कर रहा था वही पूर्ण हो रही थी ।

* यदि इच्छायें पूरी होती जायें तो, एक इच्छा के बाद दूसरी इच्छायें पनपती रहतीं हैं ।

* ऐसे निमित्त जो कल्पवृक्ष की तरह हमारी हर इच्छा पूरी करे, वह हमें स्वर्ग प्रदान करेगा या नरक ?

फिर इच्छा पूर्ण करने वाले चाहे हमारे माता-पिता ही क्यों न हों

Posted by admin on March 29, 2011 at 10:49 am ·

जीवन का उद्देश्य :-

चाँद, पृथ्वी के इर्द गिर्द चक्कर काट रहा है,
पृथ्वी सूर्य के इर्द गिर्द, सूर्य किसी महासूर्य के,
पर ये सब 1 इंद्रिय हैं।

हम तो 5 इंद्रिय, सबसे उत्कृष्ट Breed हैं,
हम क्यों पैसा, पद, पति पत्नी के इर्द गिर्द घूम-घूम कर अपना जीवन बर्बाद कर रहे हैं ?

Posted by admin on March 26, 2011 at 11:04 am ·

संसार/परमार्थ :-

संसार और परमार्थ का हिसाब एक दूसरे से उल्टा होता है ।
संसार के हिसाब से चलोगे, तो परमार्थ का हिसाब गड़बड़ा जायेगा,
परमार्थ के से चलोगे तो संसार का,
यदि दौनों के हिसाब से चलोगे तो तुम्हारा हिसाब गड़बड़ा जायेगा।

चिंतन

Posted by admin on March 25, 2011 at 10:26 am ·

स्वप्न साकार:-

भगवान के पैदा होने से पहले, उनकी माँ सोलह शुभ स्वप्न देखती हैं,
और भगवान उन सपनों को साकार कर देते हैं ।

Posted by admin on March 23, 2011 at 03:23 pm ·

संवर/निर्जरा/मोक्ष:-

शांति नगर पर, जब अशांति नगर का राजा आक्रमण करता है,
तब शांति नगर का राजा अपने नगर के सब गेट बन्द कर देता है,
यानि बाहर से कर्मो को अपने नगर में घुसने नहीं देता, संवर करता है।
फिर शहर में घुसे सैनिकों को चुन-चुन कर मार देता है, निर्जरा करता है।
तब नगर में शांति स्थापित होती है,
यानि मोक्ष मिल जाता है।

क्षु. श्री जिनेन्द्र वर्णी जी

Posted by admin on March 18, 2011 at 10:36 pm ·

ज्ञान/भान :-

चींटियाँ दीवार की किनारी पर लाईन बनाकर चलती हैं, बीच में नहीं, उनको यह भान है।

ज्ञानी सड़क के बीच में चींटियों को शक्कर डालते हैं, चींटियाँ  पैरों से कुचलकर मरती रहती हैं।
सही ज्ञान/सावधानी पूर्वक ज्ञान या अप्रमत्त अवस्था ही भान है | भान का मतलब भांपना, चौकन्ने रहना है।
पेट में 1 किलो सामान जा सकता है यह ज्ञान है, खाते समय भान नहीं रहता।

जब ज्ञान स्व और पर प्रकाशक होता है तब भान बन जाता है।

आचार्य श्री विद्यासागर जी

Posted by admin on March 17, 2011 at 12:31 pm ·

कर्मफल:-

Majority of Cases में, इस भव के कर्मों का फल इसी भव में फलित होता देखा जाता है, तो क्या पूर्व भवों के कर्मों का फल Write off हो जाता है ?

चिंतन

श्री गौरव

Posted by admin on March 15, 2011 at 01:33 pm ·

अभिषेक  :-

कलकत्ता के एक श्रीमान के अभिषेक का नियम था, जब कहीं जाते थे तो साथ में मूर्ती ले जाते थे,
और शुद्ध पानी ना मिलने पर फल के रस से अभिषेक करते थे।
                                                                                                                                                         यह सही तरीका नहीं है, अपवाद स्वरूप प्रक्षालन किया जा सकता है।

आचार्य श्री विद्यासागर जी

Posted by admin on March 13, 2011 at 11:30 am ·

संकल्प/विकल्प:-

संकल्प – मैं शरीर हूँ।
विकल्प – शरीर और शरीर से सबंधित लोगों के बारे में विचार।

यदि संकल्प सही हो कि ‘मैं आत्मा हूँ’, तो विकल्प अपने आप समाप्त हो जायेंगे।

Posted by admin on March 11, 2011 at 11:36 am ·

धार्मिक कार्यों में बोलियाँ :-

Q. क्या धार्मिक कार्यों में बोली का प्रचलन होना चाहिये?

धर्म की सेवा तन, मन, धन से करनी चाहिये।
आज कल  साधारणतः आदमी धन निकालता नहीं है, इसलिये बोलियों का सहारा लेना पड़्ता है।
पर बोलियों के लिये कम से कम समय देना चाहिये।                                                            श्री लालमणी भाई की दादी

Posted by admin on March 10, 2011 at 11:32 am ·

ज्ञानी :-

कर्मोदय में भी ज्ञानी स्वभाव को नहीं छोड़ता,
जैसे सोना तपने पर पीलापन/चमक नहीं छोड़ता।

वह जानता है कि कर्मोदय प्रयोग है, परीक्षा है,
लोहा जब तक तपता रहता है लाल रहता है, ठंड़ा होने पर काला पड़ जाता है।

आचार्य श्री विद्यासागर जी

Posted by admin on March 09, 2011 at 11:14 am ·

वक्ता :-

शास्त्र अनुलंघनीय हैं यानि जिसका उल्लघंन/अनादर न हो सके,
इसलिये शास्त्र, बुला-बुला कर किसी को नहीं सुनाना चाहिये,
भगवान के वचनों की मर्यादा का ध्यान रखना चाहिये ।

Posted by admin on March 07, 2011 at 01:17 pm ·

ममत्व : –

ममत्व कम करने के लिये इच्छाओं की सीमा कर लो ।
दुनिया यदि भूल ना पाओ तो इच्छाओं को कम कर लो ।

लड़्ड़ु की बूंदी मोह रूपी चाशनी से चिपकती है ।

ममत्व भी एक कषाय है ।

आचार्य श्री विद्यासागर जी

Posted by admin on March 06, 2011 at 12:47 pm ·

निमित्त/कर्म :-

कुत्ते को ड़ंड़ा मारो तो वह ड़ंड़ा पकड़ता है,
मारने वाले को नहीं पकड़ता, जबकि ड़ंड़ा कड़ा है, मारने वाला मुलायम ।

सिंह मारने वाले को पकड़ता है ।

निमित्त को मत पकड़ो, कर्म को पकड़ो ।

Posted by admin on March 05, 2011 at 11:59 am ·

अभयदान :-

हरी आदि छोड़ने से क्या फ़ायदा है ?

एक शेर गाय के झुंड़ में खड़ा था,
सारी गाय कांप रही थी,
शेर ने कहा – मैं केवल इस गाय को ही खाऊँगा  |
बाकि सारी गायों का कंपन समाप्त हो गया ।

Posted by admin on March 03, 2011 at 07:05 pm ·

मोबाइल और शरीर :-

मोबाइल – औदारिक शरीर
बैटरी – तैजस शरीर
सिमकार्ड़ – कार्मण शरीर

औदारिक शरीर की मृत्यु होने पर तैजस और कार्मण दूसरे औदारिक शरीर में प्रवेश कर जाते हैं ।

चिंतन

Posted by admin on March 01, 2011 at 06:27 pm ·

आसादना :-

यानि रुकावट जैसे धर्म क्रियाओं में आसादना होना ।

पं. रतनलाल जी बैनाड़ा

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

This question is for testing whether you are a human visitor and to prevent automated spam submissions. *Captcha loading...