Posted by admin on January 30, 2011 at 02:27 pm ·

अस्पर्श :-

श्री पद्मपुराण, पर्व 11 के अनुसार – कोई भी जाति निंदनीय नहीं है, गुण ही कल्याण करने वाले हैं ।
यही कारण है कि शास्त्रों में चांडालों के द्वारा अहिंसाणुव्रत आदि के पालन को सराहा गया है ।

जिज्ञासा समाधान पेज 169

Posted by admin on January 29, 2011 at 04:36 pm ·

लिंग :-

लिंग तो तीन ही हैं –
1. जिनेंद्र भगवान का दिगम्बर रूप ।
2. उत्कृष्ट श्रावकों का – इसमें 10 वीं, 11 वीं प्रतिमा वाले आते हैं।
3. आर्यिकाओं का ।

जिनभाषित पेज168

Posted by admin on January 27, 2011 at 00:36 am ·

सावधान :-

कुछ लोग हर समय एक ही गाना गाते रहते हैं – “मरने की भी फुरसत नहीं है”
कहीं आप निगोद जाने की तैयारी तो नहीं कर रहे हैं ? क्योंकि निगोद में ही मरने की फुरसत नहीं मिलती है ।

Posted by admin on January 26, 2011 at 00:16 am ·

मुमुक्षु :-

ममत्व छोड़ने वाला ।

आचार्य श्री विद्यासागर जी

Posted by admin on January 24, 2011 at 12:36 pm ·

निमित्त :-

कषाय पैदा करने में नोकषाय निमित्त होती हैं, कर्म पैदा करने में नोकर्म ।
ऐसे ही जीवन को अच्छा बनाने में किंचित अच्छाई भी निमित्त बन सकती है और गिराने/बर्बाद करने में जरा सी बुराई जैसे पूरे जंगल को जलाने में छोटी सी चिनगारी ।

चिंतन

Posted by admin on January 23, 2011 at 03:34 pm ·

सहारा :-

हीरा बहुत Pressure पड़ने से बनता है ।
जब तक पीठ पर दीवार रहेगी, आपका Pressure Transfer होता रहेगा और आप हीरा नहीं बन पायेंगे ।
Mature होने पर गुरु/भगवान का भी सहारा छोड़ना होगा।

Posted by admin on January 22, 2011 at 12:39 pm ·

आगम/अध्यात्म शास्त्र :-

आगम शास्त्र जिसमें 6 द्रव्य, 7 तत्व, सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान का स्वरूप बताया जाय जैसे तत्वार्थ सूत्र, द्रव्य संग्रह आदि ।
अध्यात्म शास्त्र, अभेद रत्नत्रय की जिसमें व्याख्या हो जैसे समयसार आदि ।

जिनभाषित – 10/10

Posted by admin on January 21, 2011 at 02:20 pm ·

जातिस्मरण :-

पिछले सात जन्मों तक के स्मरण की कथायें आदिपुराण आदि ग्रन्थों में आती हैं ।

जिज्ञासा समाधान पेज – 137

Posted by admin on January 20, 2011 at 06:08 pm ·

मन गुप्ति :-

अशुभ भावों को समाप्त करना ।

मुनि श्री क्षमासागर जी

Posted by admin on January 19, 2011 at 00:14 am ·

मिथ्यात्वी/सम्यग्दृष्टि :-

जो दूसरों में गलती ढ़ूंढ़ते हैं और अपनी प्रशंसा करते हैं, वे मिथ्यात्वी हैं ।
और जो अपने में गलती और दूसरों की प्रशंसा करते हैं, वे ही सम्यग्दृष्टि हो सकते हैं ।

कमला बाई जी

Posted by admin on January 18, 2011 at 00:02 am ·

प्रायश्चित :-

प्रायश्चित देते समय आचार्यों का गुणस्थान छ्ठा होता है ।
प्रायश्चित लेने वाले मुनिराज का सातवां हो सकता है ।

मुनि श्री सौरभसागर जी

Posted by admin on January 17, 2011 at 02:01 pm ·

देवों में समाधि :-

समाधि में शरीर और कषायों को कृश किया जाता है ।
देव आहार तो छोड़ नहीं सकते हैं पर कषायों को कृष करते हुये मरण का वर्णन आदिपुराण आदि ग्रन्थों में आया है ।

जिज्ञासा समाधान पेज – 194

Posted by admin on January 16, 2011 at 01:59 pm ·

आदिवासी :-

असली मायने में तो आदिवासी दिगम्बर मुनि होते हैं ।
आदिनाथ भगवान के समय से ‘आदि’ भेष में “वास” करते चले आ रहे हैं ।

मुनि श्री सौरभसागर जी

Posted by admin on January 14, 2011 at 00:01 am ·

ज्ञानोपयोग :-

ज्ञान का असली सदुपयोग – उसका उपयोग नहीं करना ।
ज्ञान तो सहज रूप से अपना काम करता ही रहता है ।

आचार्य श्री विद्यासागर जी

Posted by admin on January 12, 2011 at 01:33 pm ·

चारित्र :-

वह क्रिया जो कर्म बंध रोकने में कारण हो ।

Posted by admin on January 11, 2011 at 00:01 am ·

अरहंत भगवान का शरीर :-

जरा, व्याधि, दु:ख, आहार, निहार, मल-मूत्र, थूक, पसीना, वात, पित्त, कफ आदि दोषों से रहित होता है ।
मांस और रुधिर सफेद होता है ।
केश, नख नहीं बढ़ते हैं ।
स्फटिक के समान, छाया नहीं पड़ती है ।
क्षुधा, प्यास नहीं लगती है ।
निगोदिया जीवों से रहित होता है ।

Posted by admin on January 09, 2011 at 11:45 am ·

द्वादशांग वाणी :-

भगवान की वाणी द्वादशांग वाणी क्यों कही जाती है ?

पूर्ण शरीर के बारह अंग ( 1 सिर, 2 आँखें, 2 कान, 1 नाक, 1 मुँह, 2 हाथ, 1 धड़ और 2 पैर )  होते हैं,
ऐसे ही भगवान की वाणी द्वादशांग के रूप में होती है, पूर्ण होती है ।

श्री लालमणी भाई

Posted by admin on January 07, 2011 at 10:28  am ·

हिंसा :-

आत्मा प्राणों से भिन्न है, प्राणों का वियोग होने पर आत्मा को तो कुछ भी नहीं होता, तो हिंसा/अधर्म कैसे हुआ ?

प्राणों का वियोग करने से, उससे सम्बद्ध आत्मा को दु:ख होता है, अत: हिंसा/अधर्म है ।

Posted by admin on January 06, 2011 at 02:01 pm ·

इन्द्रिय सुख :-

पराश्रित और बाधा सहित होने की वज़ह से हमेशा आकुलता रहती है,
विपक्षी होने से दुखमय हैं,
कर्मबंध के कारण हैं,
विषम हैं ।

प्रवचनसार जी ( ब्र. ब्रजेश जी )

Posted by admin on January 05, 2011 at 01:45 pm ·

भेद विज्ञान :-

शरीर और आत्मा भिन्न, तो मुसीबत में खिन्न क्यों ?

आचार्य श्री विद्यासागर जी

Posted by admin on January 04, 2011 at 01:12 pm ·

चारित्र / तप :-

चार आराधनाओं में तीसरा सम्यग्चारित्र और चौथा तप बताया है।
चारित्र है तो तप अलग से क्यों लिया गया ?

चारित्र तो हिंसा रोकना, संवर आदि है, मुख्यता निवृत्ति की है, दुर्गन्धि से दूर होना है ।
तप से निर्जरा होती है, मुख्यता प्रवृति की है, सुगन्धि भर देना है।

Posted by admin on January 03, 2011 at 11:21 am ·

स्वभाव / विभाव :-

स्वभाव में आवरण पड़ा रहता है,
विभाव बाहर से आता है ।

Posted by admin on January 02, 2011 at 10:15 am ·

मनु :-

मनु को कुलकर कहा है ।

कुलकर – जो मानवों को कुल की तरह इकट्ठा रखे ।

आचार्य श्री विद्यासागर जी

Posted by admin on January 01, 2011 at 12:05 pm ·

मोह / राग / द्वेष :-

मोह – शरीर मैं हूँ,
राग – शरीर मेरा है,
द्वेष – अनुकूलता में राग होता है, प्रतिकूलता में द्वेष ।

मुनि श्री सौरभसागर जी

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