Posted by admin on October 30, 2010 at 10:32 am ·

श्री शांतिनाथ/कुन्थुनाथ/अरहनाथ भगवान :-

कामदेव :   सुंदर शरीर-   थोड़े समय का Attraction
चक्रवर्ती :   वैभव         –   थोड़े समय का Attraction
तीर्थंकर :   धर्म            –                  स्थायी Attraction

मोह के चक्र को समाप्त कर सिद्धचक्र प्राप्त किया ।

मुनि श्री सौरभसागर जी

Posted by admin on October 28, 2010 at 11:22 am ·

कुलकर :-

अवसर्पिणी के सब (चौदह) कुलकर क्षायिक सम्यग्दृष्टि होते हैं ।
जबकि उत्सर्पिणी के सारे कुलकर मिथ्यादृष्टि ही होते हैं ।

पं. रतनलाल बैनाड़ा जी

Posted by admin on October 27, 2010 at 10:58 am ·

परम स्थान :-

ये सात होते हैं –

1. सज्जाति

2. सदगृहस्थीपना

3. जिनदीक्षा

4. सुरेन्द्रता

5. साम्राज्य

6 अरहंत पद

7. परम निर्वाण पद

यह सभी स्थान भगवान के वचनों के आस्वादन से प्राप्त होते हैं ।

जिनभाषित 3/10

Posted by admin on October 25, 2010 at 11:43 am ·

मूढ़ :-

आगम की परिभाषा –    जो देव, शास्त्र, गुरू को बिना परीक्षा किये, पूजने लगता है ।

पं. रतनलाल बैनाड़ा जी

Posted by admin on October 24, 2010 at 10:24 am ·

सम्यग्दृष्टि :-

सिर पर भरा घड़ा रखकर बात करती जाती महिलायें ।

ऐसे ही सम्यग्दृष्टि जीव, सांसारिक कार्य करते हुये भी दृष्टि विवेक पर रखते हैं ।

Posted by admin on October 22, 2010 at 11:04 am ·

वर्ण व्यवस्था :-

तीर्थंकर क्षत्रिय ही होते हैं, असल में वीतराग धर्म क्षत्रियों का ही है ।

गणधर –   महावीर भगवान के सब (11) गणधर ब्राम्हण थे , पर सब तीर्थंकरों के गणधर ब्राम्हण ही हों ऐसा नियम नहीं है ।

आदिनाथ भगवान के समय तो वर्ण व्यवस्था थी ही नहीं ।

पं. रतनलाल बैनाड़ा जी

Posted by admin on October 21, 2010 at 12:14 pm ·

अभागा / भाग्यवान / बड़भागा :-

अभागा       –    मिथ्यादृष्टि ।

भाग्यवान –     सम्यग्दृष्टि / देशव्रती ।

बड़भागा     –     सम्यग्दृष्टि + साधना / तप = महाव्रती ।

देशव्रती बड़भागा में इसलिये नहीं आता, क्योंकि उसकी मंजिल तो महाव्रत थी पर उसके पुरूषार्थ में कमी रह गयी  |

श्री लालमणी भाई

Posted by admin on October 19, 2010 at 10:42 am ·

गजकुमार :-

ये श्रीकृष्ण के पुत्र थे ।

एक बार अपने पिता के साथ भगवान नेमिनाथ के समवसरण में जा रहे थे । रास्ते में ब्राम्हण की सुंदर पुत्री से उनकी सगाई करवा दी गयी ।

गजकुमार को समवसरण में वैराग्य हो गया, मुनि बनकर जंगल में तपस्या करने लगे ।

ब्राम्हण ने देखा तो बेटी का दु:ख याद कर मुनिराज के सिर पर आग जला दी ।

मुनि गजकुमार मुक्त हो गये ।

Posted by admin on October 18, 2010 at 11:03 am ·

देशना :-

 

6 द्रव्यों और 9 पदार्थों का उपदेश ।

पं. रतनचंद्र जैन- व्य. कृ.पेज- 107

Posted by admin on October 16, 2010 at 10:54 am ·

सुकौशल राजा :-

सुकौशल राजा अपने पुत्र का गर्भावस्था में ही राजतिलक कर मुनि बन गये थे ।

उन्होंने अपने पिता मुनि श्री सिद्धार्थ से मुनि दीक्षा ली । दौनों ने पर्वत पर 4 माह वर्षायोग किया । उतरते समय सुकौशल मुनिराज को उनकी पूर्व भव की माँ ,जो व्याघ्नी बन गयी थी, उन्हें खा गयी ।

मुनिराज शरीर त्याग कर सर्वार्थसिद्धी गये, फिर मोक्ष जायेंगे ।

Posted by admin on October 14, 2010 at 10:48 am ·

आगम :-

आगम पढ़ो, आगम सुनो, आगम सीखो,

और शेष को जानो, देखो और जाने दो ।

आचार्य श्री विशुद्धसागर जी

Posted by admin on October 12, 2010 at 10:45 am ·

सरीसृप :-

करकेंटा, छिपकली, नेवला आदि को सरीसृप कहते हैं ।

ये दूसरे नरक तक जा सकते हैं ।

पं. रतनलाल बैनाड़ा जी

Posted by admin on October 10, 2010 at 10:29 am ·

निर्यापक :-

सल्लेखना के समय आचार्य ही निर्यापकाचार्य होते हैं ।

यदि आचार्य ना मिलें तो उपाध्याय और उपाध्याय भी ना मिलें तो अनुभवी मुनि यह भूमिका निभाते हैं ।

भूख प्यास से यदि क्षपक की नाव तिरछी जा रही हो तो उसे वे सीधा करते हैं ।

जैनेंद्र सिद्धांत कोश – 2/625

सल्लेखना कराने के लिये कम से कम 2 तथा अधिक से अधिक 48 निर्यापक होने चाहिये ।

Posted by admin on October 08, 2010 at 10:59 am ·

प्रातिहार्य :-

प्रातिहार्य यानि सेवक, ये हर समय तीर्थंकरों के साथ रहने के कारण प्रातिहार्य कहलाये जाते हैं ।

अष्ट प्रातिहार्य हैं –

1. अशोक वृक्ष

2. सिंहासन

3. भामंड़ल

4. तीन छ्त्र

5. चंवर

6. पुष्पवृष्टि

7. दुंदुभि

8. दिव्यध्वनि

Posted by admin on October 07, 2010 at 10:37 am ·

मंगलद्रव्य :-

भगवान के विहार के समय अष्ट मंगल-द्रव्यों को लेकर  देवता लोग आगे-आगे चलते हैं ।

ये द्रव्य हैं –

1. ध्वज

2. भृंगार (झारी)

3. कलश

4. दर्पण

5. पंखा

6. चंवर

7. छ्त्र

8. सुप्रतिष्ठ (स्वास्तिक)

Posted by admin on October 05, 2010 at 10:25 am ·

आचार्य कुन्द्कुन्द :-

आप आचार्य जिनचन्द्र के शिष्य थे तथा आचार्य उमास्वामी आपके शिष्य थे ।

जैनेन्द्र सिद्धांत कोश – भाग 2

Posted by admin on October 03, 2010 at 10:36 am ·

रत्नत्रय :-

यदि आज रत्नत्रय धाराण नहीं कर सकते हो तो,

सम्यग्दृष्टि बनकर घर में कमल की तरह भिन्न रहो ।

Posted by admin on October 01, 2010 at 10:15 am ·

निदान :-

निदान तो बड़े बाबा हैं, हम सब बड़े निदानी हैं ।

हम सब के चेतन/अचेतन मन में यह भाव रहता ही है कि जो हम धर्म कर रहे हैं उससे हमें सुख सुविधा मिलेगी ।

आचार्य श्री विद्यासागर जी

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