- April

Posted by admin on April 30, 2010 at 06:05 pm ·

संवेग :-

नरक से निकलने वाले जीव Minimum पंचेन्द्रिय, संज्ञी त्रिर्यन्च बनते हैं ।
क्योंकि हर समय नरक पर्याय से छूटने की भावना भाते रहते हैं ।

आचार्य श्री विद्यासागर जी

पर मनुष्य ऐसा जीव है जो कितना भी दु:खी हो, पर इस पर्याय को छोड़ना नहीं चाहता है |

Posted by admin on April 29, 2010 at 08:15 pm ·

सम्यकदर्शी :-

जो विपदाओं के लिये अपने को दोषी ठहराते हैं ।

Posted by admin on April 28, 2010 at 04:36 pm ·

सूतक :-

प्रियजन के जाने का दु:ख है, तो ज्यादा धर्म करो ।
प्रियजन के जाने का ज्यादा दु:ख नहीं है, तो धर्म करने में क्या कठिनाई है ?

बस भगवान का प्रक्षाल, अष्टद्रव्य से पूजा ना करें तथा जिनवाणी आदि ना छुयें।

  • चक्रवर्तीयों, क्षत्रियों और बच्चों को सूतक नहीं लगते ।

आचार्य श्री विद्यासागर जी

Posted by admin on April 27, 2010 at 11:25 pm ·

सामायिक :-

सामायिक आदि कम से कम एक महूर्त क्यों करना चाहिये ?

पंखा बंद करने पर भी बहुत देर तक घूमता रहता है,
संसारी भाव भी इसी तरह कुछ देर बाद ही शांत होते हैं ।

धर्म का महूर्त, एक महूर्त के बाद ही आता है ।

Posted by admin on April 26, 2010 at 06:05 pm ·

आहार :-

आहार के समय, मुनियों को थाली दिखाने का आगम में विधान नहीं है, पर श्रावक की Convenience के लिये किया जाता है ।
कुछ महाराज पूरी सामग्री देखना पसंद करते हैं, ताकि श्रावकों को खाने की सामग्री कम ना पड़ जाये ।

मुनि श्री आर्जवसागर जी

Posted by admin on April 25, 2010 at 04:15 pm ·

ना देवा: :-

‘ना देवा:’ का मतलब – ‘देव नहीं होते’, ऐसा नहीं है क्योंकि सूत्र पहले या आगे से जुड़े होते हैं ।
इसलिये आचार्य श्री विद्यासागर जी शास्त्र की सूत्र संख्या ना बताकर, शास्त्र बताते हैं, ताकि Isolation में पढ़कर, शास्त्र को शस्त्र ना बना लें |
शास्त्र शुरू से तथा पूरा पढ़ना चाहिये ।

Posted by admin on April 24, 2010 at 03:25 pm ·

अंतराय :-

श्रावक :- हमारे खाने में बाल क्यों नहीं आते, मुनियों के ही में क्यों ?

आपके में बाल आयेंगे तो आप क्या करोगे ? इसलिये आपका हल्ला नहीं होता ।

मुनि श्री योगसागर जी

Posted by admin on April 23, 2010 at 02:22 pm ·

परिचय :-

ज्यादा परिचय भी परिषह का कारण बनता हैं ।

मुनि श्री योगसागर जी

Posted by admin on April 22, 2010 at 01:14 pm ·

संयम :-

मुनिराज यदि किसी चीज का त्याग करते हैं और यदि वही चीज गलती से श्रावक आहार में मुनिराज के हाथ पर रख दें तो पहले ग्रास तक अंतराय नहीं मानना चाहिये ।

चीजों से दुश्मनी नहीं, यह तो संयम का अभ्यास है ।

मुनि आर्जवसागर जी

Posted by admin on April 21, 2010 at 03:35 pm ·

कषाय :-

किसी को हराना हो तो उसे गाफ़िल कर दो ।
बच्चे भी ध्यान बंटा कर धक्का दे देते हैं,
शराब पिला कर वारदातें होती हैं ।
कषायें भी हमको Careless कर देतीं हैं ।

Posted by admin on April 20, 2010 at 07:26 pm ·

श्रुत-पंचमी :-

भगवान महावीर स्वामी के निर्वाण के 683 वर्ष बाद आ. धरसेन जी के शिष्य, आ. भूतबली और आ. पुष्पदंत जी ने षटखंड़ागम शास्त्र की रचना आज के दिन ही पूरी की थी । इस शास्त्र की रचना गुजरात के अंक्लेश्वर शहर में पूरी हुई थी ।
इस महत्वपूर्ण दिवस को शास्त्रों के रख-रखाव और पूजा करके मनाया जाता है ।
इस वर्ष यह पर्व 16 जून को पड़ रहा है ।

Posted by admin on April 19, 2010 at 06:16 pm ·

साता का उदय दुखों के निवारण के लिये होना चाहिये ।
सुखों के पोषण के लिये नहीं ।

मुनि श्री अतुलसागर जी, (बाई जी)

Posted by admin on April 18, 2010 at 01:11 pm ·

T. V. देखना :-

T. V. देखने से कर्मों का अनुभाग ज्यादा बंधता है और एकेन्द्रिय जीव का बंध होता है ।
क्योंकि T. V. देखते समय आप चारों इन्द्रियों का दुरुपयोग कर रहे होते हैं, इसलिये अगले जन्म में 4 इन्द्रियां आपको नहीं मिलेंगी।

श्री रतनलाल बैनाडा जी

Posted by admin on April 17, 2010 at 02:11 pm ·

सुकुमाल मुनि :-

सुकुमाल मुनि सर्वाद्धसिद्धि गये ।

श्री योगसागर जी महाराज

Posted by admin on April 16, 2010 at 01:11 pm ·

स्वाध्याय :-

स्वाध्याय से निर्जरा और संवर कैसे ?
स्वाध्याय के समय पाप से दूर रहते हैं तथा स्वाध्याय के दौरान श्रद्धा, निर्जरा का कारण बनती है ।

श्री योगसागर जी महाराज

Posted by admin on April 15, 2010 at 03:12 pm ·
वर्द्धमान तप :-

श्री आदिनाथ महाराज 6 माह तक तप करते रहे, आहार में अंतराय आने पर फिर 6 माह के लिये तप करने बैठ गये । इस तरह दीक्षा लेने के 12 माह बाद श्रेयांस राजा के यहां पहला आहार हुआ।
इसके पश्चात मुनिराज हर 12 माह के बाद उठते रहे क्योंकि तीर्थंकरों के वर्द्धमान तप होता है, एक बार 12 माह बिना आहार के तप कर लेने के पश्चात, दुबारा 12 माह से पहले आहार के लिये नहीं उठते हैं । यह अवधि अंतराय आदि की स्थिति में बढ़ तो सकती है पर कम नहीं हो सकती है ।

पांड़व-पुराणम् पृष्ठ 41

Posted by admin on April 14, 2010 at 01:11 pm ·

सकल संयम :-

कोई भी जीव अधिक से अधिक 32 बार ही सकल संयम धारण कर सकता है, उसके बाद मोक्ष जायेगा ही ।

कर्मकांड़ गाथा : – 619

Posted by admin on April 13, 2010 at 05:15 pm ·

कर्म :-

आत्मा के साथ कर्म ऐसे रहते हैं जैसे तिल में तेल ।
अलग-अलग होने पर उनका अस्तित्व अलग-अलग पता लगता है ।