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Posted by admin on May 31, 2010 at 06:05 pm ·

कर्मबंध :-

कर्मबंध ज्ञानावरण, दर्शनावरण और अंतराय से नहीं होता, सिर्फ़ मोहनीय से ही होता है ।

Posted by admin on May 30, 2010 at 10:50 pm ·

रामचंद्र जी की आयु :-

रामचंद्र जी की आयु सोलह हजार वर्ष थी ।

Posted by admin on May 29, 2010 at 1:05 am ·

तीर्थंकर प्रकृति :-

तीर्थंकर प्रकृति का बंध केवली के पाद मूल में जरूरी नहीं है ।

आचार्य श्री विद्यासागर जी

जीवकांड़ और कर्मकांड़ के अलावा और किसी शास्त्र में पादमूल जरूरी नहीं बताये हैं ।

श्री धवला जी – श्री रतनलाल बैनाडा जी

Posted by admin on May 28, 2010 at 1:18 pm ·

आर्त- ध्यान : –

आर्त-ध्यान से तिर्यँच गति जाते हैं, तो छठे गुणस्थानवर्ती मुनिराज को भी बंध होगा ?
तिर्यँच गति दुसरे गुणस्थान तक ही बंधती है । अगले गुणस्थानों में आर्त-ध्यान प्रशस्त और कम समय के लिये होता है । इसलिये मुनिराजों तिर्यँच गति का बंध नहीं होता है ।

Posted by admin on May 27, 2010 at 011:05 pm ·

तत्वार्थ सूत्र : –

तत्वार्थ सूत्र, सामायिक के समय नहीं पढ़ना चाहिये, रात्रि में पढ़ सकते हैं ।
भावनात्मक, स्तुति – परत शास्त्र किसी भी समय में पढ़ सकते हैं ।

Posted by admin on May 26, 2010 at 06:08 pm ·

कर्म : –

हम सब Actor हैं, सब अपने कर्मों के अनुसार सही Acting ही कर रहे हैं ! यही Acting करने को मजबूर हैं ।
तो फिर Change करने की क्या जरूरत ? और Change कर भी कैसे सकते हैं ?
अपने पुरुषार्थ से, सिर्फ अपना रोल हम Director (कर्म) के कहे से भी बेहतर अदा कर सकते हैं।

Posted by admin on May 25, 2010 at 05:45 pm ·

अभव्य : –

अभव्य समोषरण में क्यों नहीं जाना पसंद करते ?
समोषरण में मोक्ष की शिक्षा होती है, जिसे मोक्ष जाना ही नहीं उनका उस Class में क्या काम ?

Posted by admin on May 24, 2010 at 12:05 pm ·

सम्यग्दर्शन : –

जीवन भर पहली कक्षा में ही रहना चाह्ते हो ?
नहीं, तो प्रशम, संवेग, अनुकम्पा, आस्तिक्य, की पढाई कर चौथी कक्षा ( 4 गुणस्थान में सम्यग्दर्शन ) तक तो पहुंचो, पहली मिथ्यात्व की कक्षा में तो मत पड़े रहो ।

आचार्य श्री विद्यासागर जी

Posted by admin on May 23, 2010 at 05:12 pm ·

सम्यग्दर्शन : –

सम्यग्दर्शन चाहते हो तो -
1. बुरा मत मानो ( मिथ्यात्व नहीं )
2. बैर मत रखो ( अनंतानुबंधी नहीं )
3. सत्य आचरण करो ( धर्म प्रभावना )
4. पर निंदा मत करो ( उपगूहन )

Posted by admin on May 22, 2010 at 11:32 pm ·

विनय : –

भगवान को धोक दोगे तभी तो उनकी कृपाद्रष्टि आप पर पड़ेगी ।
( क्योंकि भगवान तो नासाद्रष्टि में रहते हैं )

Posted by admin on May 21, 2010 at 04:42 pm ·

सम्मेद शिखर : –

सम्मेद शिखर पर चढ़ते समय आचार्य श्री विद्यासागर जी सब मुनिराजों से पहले थूक लेने तथा नाक सिनकने के लिये कहते हैं ।
( ताकि पवित्र पर्वत पर ये क्रियायें ना करनी पड़ें )

Posted by admin on May 20, 2010 at 01:12 pm ·

ऋद्धि/सिद्धी : –

ऋद्धि = आत्मा में तप से प्रकट होती है, केवलज्ञान भी एक ऋद्धि है ।
सिद्धी = सिद्धी को विद्या सिद्धी भी कहते हैं, जो व्यंतर देवों की सिद्धी से प्राप्त होती है ।

( बाई जी )

Posted by admin on May 19, 2010 at 01:35 pm ·

करूणा दान : –

जीवित अवस्था में आँख आदि अंग के दान की आगम में मनाही है ।
पर मृत्यु के बाद नहीं, मृत्यु के बाद यह करूणा दान में आयेगा ।
व्रती लोगों के अंगों का दान लोक व्यवहार से सही नहीं है ।

श्री रतनलाल बैनाडा जी

Posted by admin on May 18, 2010 at 02:22 pm ·

ब्रह्मचर्य व्रत : –

ब्रह्मचर्य व्रत देते समय आचार्य श्री विद्यासागर जी से पूछा – क्या सावधानी बरतें ?
आचार्य श्री विद्यासागर जी – इष्ट, अनिष्ट और गरिष्ठ ना खायें ।

Posted by admin on May 17, 2010 at 12:02 pm ·

युद्ध : –

राम जब युद्ध में जाते थे तो दुःखी होते थे कि अब लड़ना पड़ेगा ।

Posted by admin on May 16, 2010 at 11:40 pm ·

मोक्ष : –

आचार्य श्री विद्यासागर जी शांतिसागर जी महाराज सागर आने पर श्री गणेशप्रसाद वर्णी जी से मिले और उनसे कहा कि – मुनि बन जाओ, आपका ज्ञान तो बहुत अच्छा है ।
वर्णी जी – नहीं महाराज मुझे जल्दी मोक्ष जाना है । आप तो ऊपर वाले स्वर्ग में जाओगे, मैं निचले स्वर्ग से जल्दी वापस आकर जल्दी मोक्ष जाना चाहता हूँ ।

श्री रतनलाल बैनाडा जी

Posted by admin on May 15, 2010 at 10:32 pm ·

मोक्ष मार्ग : –

मोक्ष मार्ग की साधना के लिये आवश्यक -

  1. अज्ञान निव्रत्ति
  2. विषय त्याग
  3. व्रत / त्याग
  4. विकल्पों की शून्यता

Posted by admin on May 14, 2010 at 11:12 pm ·

देव : –

जो देव नरकों में जाते हैं, वे नारकियों को लड़वाते भी हैं और खुद भी नारकियों की पिटाई करते हैं ।

Posted by admin on May 13, 2010 at 05:30 pm ·

कल्याणक : –

भगवान का पांचवां कल्याणक होता नहीं, हो जाता है ।
(क्योंकि ये मोक्ष कल्याणक भगवान की अनुपस्थिति में होता है )

Posted by admin on May 12, 2010 at 04:11 pm ·

अभव्य : –

बेंत के पेड़ ( अभव्य ) पर कितना भी अमृत बरसाओ, उस पर फूल और फल नहीं लगते हैं ।

श्री लालमणी भाई

Posted by admin on May 11, 2010 at 01:12 pm ·

जैनेन्द्र सिद्धांत कोश : –

जैनेन्द्र सिद्धांत कोश में 150 ग्रंथों से चयन किया गया था , यह 17 वर्षों में पूर्ण हुआ, जबकि वर्णी जी T.B. से पीड़ित थे ।

Posted by admin on May 10, 2010 at 02:32 pm ·

अनुबद्ध केवली : –

भगवान महावीर को मोक्ष हुआ तब गौतम स्वामी को केवलज्ञान हुआ था, गौतम स्वामी के मोक्ष होने पर सुधर्मास्वामी को केवलज्ञान और सुधर्मास्वामी के बाद जम्बूस्वामी को केवलज्ञान हुआ, इस लगातार परंपरा के केवलियों को अनुबद्ध केवली कहते हैं ।

Posted by admin on May 09, 2010 at 11:45 pm ·

णमोकार मंत्र : –

पारसकुमार ने सर्प को उपदेश दिया था । ( तीर्थंकर णमोकार मंत्र नहीं बोलते हैं )

जिज्ञासा समाधान पेज नं. 5

Posted by admin on May 08, 2010 at 12:00 pm ·

भक्ष्य : –

जामुन, खजूर, कैथ, बेर भक्ष्य हैं ।

पांड़व-पुराणम् पृष्ठ 31

Posted by admin on May 07, 2010 at 06:35 pm ·

विवेक : –

आचार्य श्री विद्यासागर जी से पूछा कि कोई आर्यिका माताजी अपनी पूजा करायें तो क्या करें ?
आचार्य श्री विद्यासागर जी – विवेक से काम करो ।

श्री रतनलाल बैनाडा जी

Posted by admin on May 06, 2010 at 04:15 pm ·

अंतराय/पुरूषार्थहीनता : –

अंतराय और पुरूषार्थहीनता में क्या फ़र्क है ?
अंतराय Occasional होता है जबकि पुरूषार्थहीनता Regular/Continuously होती है ।

Posted by admin on May 05, 2010 at 12:30 pm ·

किवदंतियां : –

किवदंतियां गुणों को बढ़ाने के लिये प्रचलित होतीं हैं – जैसे कुंदकुंद स्वामी विदेह गये ।

श्री रतनलाल बैनाडा जी

Posted by admin on May 04, 2010 at 12:12 pm ·

अवर्णवाद : –

अच्छे लोगों की कंपनी बड़े पुण्य से मिलती है, यदि उन पर दोष लगाते रहेगें तो वह संग छूट जायेगा, अवर्णवाद से सच्चे देव, शास्त्र, गुरू भी छूट जायेंगे।
सीता जी को अवर्णवाद से ही पति से विछोह हुआ था ।
पर विछोह तो आर्यिका बन कर भी हुआ था ?
अशुभ कर्मों से जो विछोह होता है उससे संक्लेषित परिणाम होते हैं ।
शुभ पुरूषार्थ से जो विछोह होता हैं उससे शुभ परिणाम होते हैं ।

Posted by admin on May 03, 2010 at 06:36 pm ·

आदर्श शादी : –

1. पहले विधान
2. दिन में शादी
3. आतिशबाजी का उपयोग नहीं
4. घोड़ा आदि जानवरों का प्रयोग नहीं
5. चांदी के बरक का उपयोग नहीं
6. चमड़े की वस्तु का उपयोग नहीं
7. सिल्क के कपड़े नहीं
8. शोध के खाने की व्यवस्था
9. जमींकंद का उपयोग नहीं
10. दहेज के नाम पर पूजा के सिर्फ आठ बर्तन
11. बहु का ग्रह-प्रवेश के समय जिनवाणी हाथ में
12. आसपास के तीर्थों की यात्रा

( इस तरह की शादियां आजकल होने लगी हैं, मुम्बई के श्री एस.के.जैन/शशी जैन के बेटे मिहुल तथा बेटी निधि (Now selected in Allied Service) की शादियों में ऊपर की Condition का ध्यान रखा गया था । )

Posted by admin on May 02, 2010 at 04:14 pm ·

मुनि : –

मुनि की 3 मुख्य क्रियायें – आहार, निहार ( देखकर), विहार ।

Posted by admin on May 01, 2010 at 02:05 pm ·

गणधर : –

प्रश्न :- बिना गणधर की उपस्थिति के भगवान की वाणी खिरती है या नहीं ?
उत्तर :- आदिनाथ भगवान के समवसरण में बिना गणधर की उपस्थिति के भगवान की वाणी भरत के प्रश्न पूछ्ने पर खिरी थी, क्योंकि उनके छोटे भाई अव्रती अवस्था में वहां उपस्थित थे, जो बाद में उनके पादमूल में दीक्षित होकर उनके गणधर बने । पूर्व दीक्षित मुनिराज गणधर नहीं बनते हैं ।

जिज्ञासा समाधान पेज नं. 11