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Posted by admin on July 31, 2010 at 08:03 am ·

राग/बंध :-

वस्तु नहीं मिलने पर, जीव राग करके रह जाता है, फिर उस वस्तु को भूल जाता है,
बंध सिर्फ उस समय ही होता है ।
वस्तु मिल जाने पर उससे राग लगातार होता रहता है, बंध भी लगातार होता रहता है ।

सम्यग्दर्शन पेज 251

Posted by admin on July 30, 2010 at 08:12 am ·

गुरूपूर्णिमा :-

जैन शास्त्रों में इसका विधान नहीं है ।
आचार्य श्री विद्यासागर जी इसको महत्व नहीं देते हैं ।

श्री रतनलाल बैनाडा जी

Posted by admin on July 29, 2010 at 09:53 am ·

आश्रव/बंध :-

आश्रव – कारण है,
बंध – कार्य है ।

57 कारण दौनो के Common हैं ।

सम्यग्दर्शन पेज 251

Posted by admin on July 28, 2010 at 09:54 am ·

संकल्प/विकल्प :-

संकल्प – मोह रूप
विकल्प – राग-द्वेष रूप

दौनों अज्ञान भाव है ।

सम्यग्दर्शन पेज 251

Posted by admin on July 27, 2010 at 10:12 am ·

चातुर्मास :-

चातुर्मास यानि क्या ?
चा – चार गति का नाश करे,
तु – तत्व की पहचान करे,
र्मा – मोह का नाश करे,
स – संयम की अभिलाषा जगाये……

(श्री संजय)

Posted by admin on July 26, 2010 at 08:57 am ·

वीरशासन जयन्ती :-

आज वीरशासन इस वर्ष 26 जुलाई को पड़ी थी ।
इस दिन भगवान महावीर की दिव्यध्वनि खिरी थी, इसी दिन से महावीर भगवान का शासन काल शुरू हुआ था ।
भगवान को केवलज्ञान होने के 66 दिन बाद दिव्यध्वनि खिरी थी क्योंकि 66 दिनों तक योग्य गणधर उपलब्ध नहीं थे ।

Posted by admin on July 25, 2010 at 09:03 am ·

तीर्थंकर/चक्रवर्ती/अर्धचक्रवर्ती :-

जब जरासंघ के साथ युद्ध हो रहा था तब राजा नेमिनाथ, श्री कृष्ण के साथ थे ।

चक्रवर्ती युद्ध नहीं करते, उनका वैभव देखकर ही सब Surrender कर देते हैं ।
भरत बाहुबली का युद्ध हुंड़ावसर्पिणी की वजह से अपवाद था ।

पर अर्द्धचक्रवर्ती तो युद्ध करते हैं ।

Posted by admin on July 24, 2010 at 10:13 am ·

व्यवहार/निश्चय :-

बिना धोये कपड़े पर रंग नहीं चढ़ता ।
व्यवहार रत्नत्रय से कपड़ा धोयें, अशुभ हटायें,
निश्चय रत्नत्रय से कपड़ा को मोक्ष के रंग में रंगें ।

सम्यग्दर्शन पेज 245

Posted by admin on July 23, 2010 at 10:03 am ·

चातुर्मास :-

बरसात में बहुत जीव राशि पैदा हो जाती है इसलिये साधुजन विहार नहीं करते और एक स्थान पर ही धर्मध्यान करते हैं और श्रावकों को भी कराते हैं । चूँकि बरसात में व्यवसाय भी कम हो जाता है अत: श्रावक भी अपना अधिक समय धर्मध्यान के लिये निकाल लेते हैं ।
साधुजनों के उन स्थानों पर रहने के संकल्प की घोषणा को चातुर्मास की स्थापना कहते हैं । इस बार २४ तारीख को स्थापना हुई थी ।
24 जुलाई से एक सप्ताह तक साधुजन स्थापना करते रहेंगे ।

Posted by admin on July 22, 2010 at 08:32 am ·

याचना – परिषह :-

दिगम्बर सम्प्रदाय में – साधुओं को आहार के लिये याचना नहीं करना ।
श्वेताम्बर सम्प्रदाय में – याचना करके आहार लेना ।

श्री रतनलाल बैनाडा जी

Posted by admin on July 21, 2010 at 09:41 am ·

श्रुत केवली/ केवली :-

श्रुत केवली का ज्ञान ग्यारह अंग + चौदह पूर्व का या बारह अंग का या श्रुत का पूर्ण ज्ञान होता है ।

केवली का संपूर्ण ज्ञान कहलाता है ।
जो श्रुत केवली के ज्ञान से अनंत अनंत गुणा होता है ।

श्री रतनलाल बैनाडा जी

Posted by admin on July 20, 2010 at 11:00 am ·

प्राकृत भाषा :-

प्राकृत भाषा के बाद संस्कृत भाषा आयी ।
आचार्य समंतभद्र स्वामी और उमास्वामी ने शास्त्रों की रचना पहली बार संस्कृत में की थी ।

Posted by admin on July 19, 2010 at 12:10 am ·

अर्धमागधी भाषा :-

तीर्थंकरों की दिव्यध्वनि अर्धमागधी भाषा में खिरती है ।
‘अर्ध’ याने आधी भाषा बीजाक्षरों में, जिसे गणधर ही समझते हैं तथा आधी को मागधी देव समवशरण के सब जीवों तक पहुँचाते हैं ।
हर जीव आधी भाषा को समझता है, यह दिव्यध्वनि की विशेषता होती है ।

श्री रतनलाल बैनाडा जी

Posted by admin on July 18, 2010 at 11:11 am ·

अंतराय कर्मबंध :-

कोई नुकसान वाला खाना खा रहा हो, सोता ही जा रहा हो, तो उसे रोकने पर अंतराय कर्म का बंध नहीं होगा ।
अंतराय कर्मबंध आपके खराब उद्देश्य से बंधता है ।

Posted by admin on July 17, 2010 at 10:26 am ·

ज्ञान :-

प्रश्न :- यदि एक ज्ञान होगा तो कौन सा ?
उत्तर :- तत्वार्थ सूत्र के अनुसार – केवलज्ञान ।
पर अकलंक स्वामी के अनुसार – केवलज्ञान या मतिज्ञान ।

Posted by admin on July 16, 2010 at 10:11 am ·

कुमतिज्ञान :-

असंज्ञीयों में इंद्रियों के द्वारा होता है ।
संज्ञीयों में इंद्रियों तथा मन के द्वारा होता है ।

Posted by admin on July 15, 2010 at 10:51 am ·

संवर :-

प्रत्येक क्षण होने वाले नये – नये अपराधों को रोक देना ।

Posted by admin on July 14, 2010 at 10:22 am ·

धर्मध्यान :-

रोना जानते हो ना ?
बस हो गया धर्मध्यान ।
अपने लिये रोना – आर्त, रौद्र ध्यान ।
दूसरों के लिये रोना- धर्मध्यान ।
हल्दी लगे ना फिटकरी, रंग चौखा आ जाये ।
तीर्थंकर इसी धर्मध्यान से बनते हैं ।

आचार्य श्री विद्यासागर जी

Posted by admin on July 13, 2010 at 11:16 am ·

प्राण :-

2 भेद -
1. – भाव प्राण
ज्ञान तथा दर्शन दो प्रकार के भाव प्राण होते हैं ।
2. – द्रव्य प्राण
पांच इन्द्रियां, तीन बल ( मन, वचन तथा काय ), आयु, श्वासोच्छ्वास नामक दस द्रव्य प्राण होते हैं ।

सम्यग्दर्शन

Posted by admin on July 12, 2010 at 11:13 am ·

अहिंसक :-

जैन नहीं, अहिंसक बनाओ – मांस, मदिरा छुड़ाओ ।
एक धीवर ने एक मछ्ली का त्याग किया, अगले भव से सर्वाथसिद्धि गया ।

आचार्य श्री विद्यासागर जी

Posted by admin on July 11, 2010 at 11:00 am ·

श्रद्धा :-

पं. कैलाशचंद्र शास्त्री, आचार्य श्री विद्यासागर जी के पैर के अंगूठे से जब तक अपना सिर नहीं लगा लेते थे तब तक उनको आनंद नहीं आता था ।

श्री रतनलाल बैनाडा जी

Posted by admin on July 10, 2010 at 10:52 am ·

हमारी भूमिका :-

हमारी भूमिका अपने लिये उपादान और दूसरों के लिये निमित्त बनने की है ।
यदि हम निमित्त बनने से चकरायेंगे तो हमारी भूमिका आधी/अधूरी रह जायेगी, हमारी ही हानि होगी ।

भगवान भी निमित्त बनते हैं, इसीलिये पूर्ण हैं ।
इसीलिये हम सिद्धों से पहले, अरहंतों को नमस्कार करते हैं ।

निमित्त बनने से हमारी हीनता की भावना समाप्त हो जाती है ।

Posted by admin on July 09, 2010 at 09:54 am ·

हेय/उपादेय :-

कर्मधारा में रंगी सर्व क्रियायें हेय हैं ।
ज्ञानधारा/धर्मधारा में रंगी सर्व क्रियायें उपादेय हैं ।

Posted by admin on July 08, 2010 at 10:10 am ·

धर्म :-

धर्म जनमत के अनुसार नहीं, जिनमत के अनुसार करना चाहिये ।

(श्री संजय)

Posted by admin on July 07, 2010 at 12:12 am ·

आत्मा :-

प्रश्न :- छिपकली की पूँछ तड़पती है, तो क्या उसमें आत्मा के अंश हैं ?

श्री धर्मेंद्र

उत्तर :- नहीं, जैसे Fan Off करने के बाद भी चलता रहता है ।
Science के अनुसार उसका Blood Circulation System अलग किस्म का होता है, जिसकी वजह से उसकी पूँछ दुबारा Develop भी हो जाती है ।

Posted by admin on July 06, 2010 at 11:35 am ·

आत्मा :-

प्रश्न :- मरने के बाद आत्मा को मालूम है कि उसे कहां जाना है, या यात्रा शुरू करने के बाद Suitable वातावरण मिलने पर, वह यात्रा स्थगित करती है ?
उत्तर :- ना आत्मा को मालूम है और ना ही कर्मों को ।
गति नामकर्म उस गति में आत्मा को ले जाता है ।

Posted by admin on July 05, 2010 at 11:12 am ·

आत्मा :-

प्रश्न :- क्या मरते समय आत्मा 9 द्वारों से निकलती है ?
उत्तर :- नहीं, आत्मा अमूर्तिक है शरीर के आकार/Full Form में निकलती है ।
जैसे हाथी की हाथी के रूप में ही निकलेगी, उसे द्वारों की जरूरत नहीं, ना ही इतना बड़ा आकार द्वार से निकल सकता है ।

Posted by admin on July 04, 2010 at 10:12 am ·

संवर :-

संवर दो प्रकार का होता है ।

  • भाव संवर – जिन भावों से संवर हो ।
  • द्रव्य संवर – कर्मों का रूक जाना ।

Posted by admin on July 03, 2010 at 11:45 am ·

संल्लेखना :-

संल्लेखना, अधिक से अधिक 48 मुनि कराते हैं ।
यदि क्षपक अस्वस्थ हों तो कुछ मुनि खाने की, कुछ पीने के पानी आदि की व्यवस्था करते हैं,
क्षपक को समझाते हैं, सम्बोधन करते हैं, प्रायश्चित दिलाते हैं,
और यदि दोष लग गया तो सल्लेखना दुबारा से शुरू कराते हैं ।

श्री रतनलाल बैनाडा जी

Posted by admin on July 02, 2010 at 10:54 am ·

परिभाषाऐं :-

मार्गणा = खोजना ।
गति = एक भव से दूसरे भव में गमन करना ।
योग = आत्मा के प्रदेशों का संकोच और विस्तार रुप होना ।
(शुभ और अशुभ कर्मो का असर आत्म प्रदेशों पर एक सा पड़ता है – श्री रतनलाल बैनाडा जी)

लेश्या = मिथ्यात्व, असंयम, कषाय व योग ।
(कषाय में प्रमाद तथा अविरति दोनों आ जाते हैं)

स्याद्वाद

Posted by admin on July 01, 2010 at 10:34 am ·

धर्म/सुधर्म :-

धर्म- वस्तु का स्वभाव ही धर्म है ।
जैसे- आग का स्वभाव ताप,
आग यदि घर को जलायेगी, तो भी वह उसका धर्म हुआ।

सुधर्म-स्वभाव का सही उपयोग सुधर्म है।
जैसे- आग का सही उपयोग, खाना पकाना ।

हम अपने स्वभाव का सही उपयोग करें यानि धर्म से सुधर्म की ओर जाने का पुरुषार्थ ही, जीवन का उद्देश्य है।