- June

Posted by admin on June 30, 2010 at 10:34 am ·

संसार से अनभिग्यता, आत्मज्ञान की ओर ले जाती है और उससे ही सर्वज्ञता आती है ।

आचार्य श्री विद्यासागर जी

Posted by admin on June 29, 2010 at 10:29 am ·

हम सब सर्दी गर्मी से Protection के लिये कमरा बनवाते हैं ।
यदि पांच अणुव्रतों का कमरा बनवायें तो चार दीवारें होंगी – अहिंसा, सत्य, अचौर्य, ब्रम्हचर्य और छत होगी अपरिग्रह की ।
पर ध्यान रहे यदि परिग्रह की छ्त मोटी पड़ गई तो चारों धर्म की दीवारें चकनाचूर हो जायेंगी ।
इस कमरे में खिड़कियां भी बड़ी और कांच की ना लगवायें वरना कमरा कमजोर होगा और बड़ी बड़ी खिड़कियों से कर्मों का आश्रव भी अधिक होगा ।

एक चिंतन

Posted by admin on June 28, 2010 at 10:34 am ·

देवियों की लेश्या :-

चूंकि देवियां पहले और दूसरे स्वर्ग में ही पैदा होतीं हैं,
इसलिये उनके पीतलेश्या ही होती है।

ये देवियां पहले स्वर्ग में पैदा होकर 1,3,5…….15 स्वर्ग तक ले जायीं जातीं हैं,
तथा दूसरे स्वर्ग से 2,4,6……..16 स्वर्ग तक ऊपर के देवों के द्वारा ले जायीं जातीं हैं।

जिन ऊपर के स्वर्गों में देवता इनको ले जाते हैं,
उन देवताओं की लेश्यायें शुक्ल तक होती हैं ।

जिज्ञासा समाधान पेज 83

Posted by admin on June 27, 2010 at 10:32 am ·

आकाशगामिनी रिद्धि :-

इसमें सुखासन या खड़े होकर, बिना ड़ग भरे आकाश में गमन करते हैं |

आकाशचारण रिद्धि :-

इसमें भूमि से चार अंगुल ऊपर गमन करते हैं।

मुनि श्री क्षमासागर जी

Posted by admin on June 26, 2010 at 10:04 am ·

देवियां :-

ह्रीं और श्री नाम की देवियां व्यन्तर जाति की होती हैं ।

जिनभाषित सित-09

Posted by admin on June 25, 2010 at 10:04 am ·

श्रेणिक की नरक आयु :-

एक मत के अनुसार -
यशोधर मुनि को श्रेणिक मारने जारहे थे, बीच में सांप दिख गया, जिसे मारकर उन्होंने मुनिराज के गले में ड़ाल दिया था ।

श्रेणिक पुराण

दूसरा मत – अति आरंभ, परिग्रह, तीव्र मिथ्यात्व, कषाय और भोगों में आसक्ती के कारण उनकी नरक आयु बंधी थी । उत्तर पुराण, महापुराण, हरिवंश पुराण

जिनभाषित सित-09

Posted by admin on June 24, 2010 at 11:07 am ·

तत्वार्थ सूत्र (मोक्ष शास्त्र ) :-

यह प्रथम संस्कृत का ग्रंथ है ।
इसमें झगड़े का ‘झ’ और फूट का ‘फ’ प्रयोग नहीं किया गया है ।
यह सूत्र ग्रंथ है । ( अक्षर कम, अर्थ ज्यादा )
इसमें 357 सूत्र हैं ।

सामायिक में इसका चिंतन करना चाहिये ।

पं. रतनलाल जी इन्दौर

Posted by admin on June 23, 2010 at 09:25 am ·

संसार :-

संसार की ओर मुड़ना और संसार से मुड़ने में बहुत फर्क है ।

आचार्य श्री विद्यासागर जी

Posted by admin on June 22, 2010 at 12:44 am ·

कार्य के कारण -

उपादान – व्यक्ति की आंतरिक शक्ति ।
निमित्त – बाह्यकारण ।
प्रतिबंधक – अवरोध ( Obstruction ) ।

किसी भी कार्य के सफल होने में तीनों ही कारणों की भुमिका होती है ।

पं. रतनलाल जी इन्दौर

Posted by admin on June 21, 2010 at 09:51 am ·

कषाय :-

मंद कषाय – मिट्टी का पानी से गीला होना और सुखने पर मिट्टी का कड़क हो जाना ।
तीव्र कषाय – पानी का पत्थर पर असर नहीं होना ।

आचार्य श्री गुप्तिनंदि जी

Posted by admin on June 20, 2010 at 09:44 am ·

भरत चक्रवर्ती :-

भरत चक्रवर्ती को अवधि ज्ञान था ।
उनके सेनापति जय कुमार, गणधर बनकर मोक्ष गये थे ।
जय कुमार की पत्नी सुलोचना, आर्यिका बनकर देव बनीं थीं ।

पाण्डव पुराण

Posted by admin on June 19, 2010 at 08:44 am ·

भरत चक्रवर्ती :-

भरत केवलज्ञान के बाद बहुत समय तक संसार में रूके रहे थे।

मुनि श्री योगसागर जी

Posted by admin on June 18, 2010 at 09:15 am ·

अनुबद्ध केवली :-

एक जीव मोक्ष गये, उसी दिन दूसरे को केवलज्ञान हो गया ।
गौतमस्वामी, सुधर्माचार्य और जम्बूस्वामी ये तीनों अनुबद्ध केवली थे ।
इनके बाद 5 सामान्य केवली हुये और अंतिम थे श्रीधर जी जो कुंड़लपुर से मोक्ष गये ।
ग्वालियर से श्री सुप्रतिष्ठत जी मोक्ष गये थे ।

बाई जी

Posted by admin on June 17, 2010 at 03:25 pm ·

प्रतिष्ठित :-

सब हरी और कच्ची सब्जियां सप्रतिष्ठित होती हैं ।
पक जाने पर अप्रतिष्ठित हो जाती हैं ।

श्री रतनलाल बैनाडा जी

Posted by admin on June 16, 2010 at 04:11 am ·

लोक की रचना :-

प्रश्न – शास्त्रों की लोक की रचना, आम आदमी के समझ में क्यों नहीं आती ?
उत्तर – बच्चों को चन्द्रमा के बारे में सिर्फ़ यह बताया जाता है, कि वह बताशे जैसा सफ़ेद, गोल और छेद-छेद वाला है ।
क्योंकि उनको चन्द्रमा की सही रचना समझ नहीं आ सकेगी ।

हम अल्प बुध्दियों को लोक की रचना समझाने के लिये शास्त्रों में स्थूल इशारे दिये गये हैं ।

एक चिंतन

Posted by admin on June 15, 2010 at 04:12 am ·

अशुभ नाम कर्म : –

अशुभ नाम कर्म का बंध तीन कारणों से होता है ।

1. योग वक्रता से – ——————————-स्वंय के लिये ।

2. विसंवाद से ————————————-दूसरों के लिये ।

3. अशुभ कार्यों से – जैसे व्यसन सेवन आदि – सबके लिये ।

Posted by admin on June 14, 2010 at 03:11 am ·

निदान : –

चक्रवर्ती पद निदान से जिन जीवों को मिलता है, वे नरक जाते हैं । स्वर्ग और मोक्ष जाने वाले जीव निदान से चक्रवर्ती नहीं बनते हैं ।

श्री रतनलाल बैनाडा जी

Posted by admin on June 13, 2010 at 01:11 am ·

दर्शन/ज्ञान :-

चक्षु, अचक्षु और अवधिदर्शन तथा उनके ज्ञान क्रमश: होते हैं तो केवलदर्शन, केवलज्ञान युगपत क्यों ?

पहले तीन का Action तो Start होता है, लेकिन केवलदर्शन, केवलज्ञान का Action Start नहीं होता, Continuously प्रत्यक्ष दिखता रहता है ।

एक चिंतन

( आगम के अनुसार वीर्यान्तराय कर्म की अनुपस्थिति में केवलदर्शन और केवलज्ञान युगपत होते हैं । – श्री रतनलाल बैनाडा जी)

Posted by admin on June 12, 2010 at 02:00 am ·

उपयोग :-

अशुभोपयोग :- तीव्र कषाय रूप परिणाम
शुभोपयोग :- मंद कषाय रूप परिणाम
शुद्धोपयोग :- कषाय रहित परिणाम

श्री रतनलाल बैनाडा जी

Posted by admin on June 11, 2010 at 12:11 am ·

मोह :-

मोह = मिथ्यात्व + कषाय ( चारित्र )
माया और लोभ राग है । जबकि क्रोध और मान द्वेष हैं ।

श्री रतनलाल बैनाडा जी

Posted by admin on June 10, 2010 at 11:12 am ·

आत्मापना :-

हम आत्मा में आत्मापना कैसे मानते हैं ?
शरीर को ही आत्मा मान लिया है ।
मैं ये नहीं कहता कि मेरी आत्मा है, बल्कि कहता हूँ कि ” मैं आत्मा हूँ ”

श्री रतनलाल बैनाडा जी

Posted by admin on June 09, 2010 at 04:52 am ·

देवगति :-

देवगति में दुख क्यों ?
और और भोग की भावना भाने से ।

Posted by admin on June 08, 2010 at 02:14 am ·

देवता :-

देवताओं में असाता साता में बदल जाती है । द्रव्य, क्षेत्र, काल और भाव के प्रभाव से ।

Posted by admin on June 07, 2010 at 04:02 am ·

शरीर की स्थिति :-

देवताओं का शरीर अंत से 6 माह पहले कमजोर होने लगता है, भोगों में अरूचि होने लगती है ।
जैसे 6 माह पहले हमारा वारंट आ जाये तो क्या भोगों में मन लगेगा ?
भोगभूमि में अंत से 9 माह पहले शरीर कमजोर होने लगता है और तभी गर्भधारण भी हो जाता है ।
कर्मभूमि में आधी आयु बीतने पर शरीर कमजोर होने लगता है ।

मुनि श्री अभयसागर जी

Posted by admin on June 06, 2010 at 03:18 am ·

बहुबीजा :-

पपीता, टमाटर बहुबीजा नहीं हैं, संघ में लेते हैं । -बाई जी
बहुबीजा शब्द जैन शास्त्रों का नहीं है, ऐसा आचार्य श्री विद्यासागर जी विद्यासागर जीकहते हैं ।

श्री रतनलाल बैनाडा जी

Posted by admin on June 05, 2009 at 4:37 pm ·

मिथ्या-ज्ञान :-

ज्ञान मिथ्या नहीं होता पर मिथ्यात्व के साथ होने वाले ज्ञान को मिथ्या-ज्ञान कहते हैं |

श्री रतनलाल बैनाडा जी

Posted by admin on June 04, 2009 at 3:17 pm ·

क्षमा :-

उत्तम क्षमा सिद्धोँ में भी पाई जाती है, वे निश्चय से अपने को आत्मा ही मानते हैं।

श्री रतनलाल बैनाडा जी

Posted by admin on June 03, 2009 at 1:37 pm ·

केवली :-

भगवान के केवल-ज्ञान होते समय शरीर परम औदारिक हो जाता है, तो क्या सारे निगोदिया जीव मर जाते हैं ?
बारहवें गुणस्थान में पहुँचने पर बादर निगोदिया जीव उनके शरीर में उत्पन्न होना बंद कर देते हैं और जो हैं वे आयु पूर्ण कर तेरहवें गुणस्थान में आते आते मरण को प्राप्त हो जाते हैं | इसलिये हिंसा का प्रश्न ही नहीं है ।

ज़िनभाषित मार्च 09

Posted by admin on June 02, 2009 at 12:40 pm ·

तीन मूढ़ता :-

कुदेव, कुगुरू, कुधर्म ( लोक ) अश्रद्धा का विषय है, जबकि छ: अनायतन स्थान की अपेक्षा है ।

Posted by admin on June 01, 2009 at 07:02 pm ·

श्वांसोच्छवास :-

आहार श्वांस जैसा है, उच्छवास निहार है ।