वचनामृत – मुनि श्री क्षमासागर

क्षमा

शांत-स्वभावी की क्षमता बढ़ जाती है।

झगडे में शोर बहुत होता है, सुलह शान्ति से होती है ।

आत्मा का स्वभाव झुकना है, पर हम इंतजार करते हैं कि पहले सामने वाला झुके,
क्योंकि हमने अभिमान का जामा पहन रखा है।

मुनि श्री क्षमासागर जी

Archived under वचनामृत – मुनि श्री क्षमासागर Comments (1)

ब्रम्ह्चर्य

पर के पास जितना जाओगे, आत्मा से उतने ही दूर हो जाओगे ।
शुक देव को 20 साल की अवस्था में वैराग्य हो गया ओर उन्होंने घर छोड़ दिया । उनके पीछे-पीछे उनके पिता उन्हें वापस लाने के लिये जा रहे थे। जब वे एक सरोवर के पास से निकले, उसमें नहाती हुयीं स्त्रीयों ने शुक देव के निकलने पर अपने वस्त्र ठीक नहीं किये, पर जब 80 वर्षीय पिता पास से निकले तब उन्होंने अपने शरीरों को ढ़कना शुरु कर दिया ।
पिता के पूछ्ने पर स्त्रीयों ने कहा- बात उम्र की नहीं है । यदि द्रष्टि सही हो तो कपड़े सम्हालने की जरुरत नहीं है ।

ब्रम्ह्चर्य, सिर्फ शरीरिक पवित्रता ही नहीं बल्कि द्रष्टि की निर्मलता का नाम है।

मुनि श्री क्षमासागर जी

Archived under वचनामृत – मुनि श्री क्षमासागर, Story Comments off

संसार

एक मालिक रोज चुटकुला सुनाता था
और सब Employees जोर जोर से हंसते थे,
एक दिन एक Employee नहीं हंसा,
कारण बताया – मैं नौकरी छोड़ रहा हूँ ।

यदि संसार छोड़ना है तो किस किस के मुताबिक हंसे और किस किस के लिये रोयें ।

Archived under वचनामृत – मुनि श्री क्षमासागर Comments off

दुःख

एक दुःखी आदमी देवता के पास जाकर बहुत दुःखी हुआ, उसकी शिकायत थी कि इस दुनियाँ में सबसे ज्यादा दुःख  मुझे ही क्यों मिले हैं ?

देव ने सलाह दी कि उसके शहर में एक Exhibition होने वाली है जिसमें सब दुःखी लोग अपने अपने  दुःखों की पोटलियां लटका देगें और अगले दिन वो पोटलियां Exchange करने का Chance दिया जायेगा । तुम सब से पहले जाकर सबसे छोटी पोटली लेकर चले जाना ।
अगले दिन वह आदमी अपनी ही पोटली उठाकर चला गया ।

हम अपने दुःखों को तो बढ़ाकर और दूसरों को दुःखों को कम करके देखते हैं,
पर  Interchange करने को तैयार नहीं होते हैं ।

Archived under वचनामृत – मुनि श्री क्षमासागर Comments off

ईमानदारी

ईमानदारी की नाव में बेईमानी के छेद करके, नदी पार करना चाहते हैं ।

Archived under वचनामृत – मुनि श्री क्षमासागर Comments off

श्रीफल

श्रीफल - नमकीन पानी को मीठा करके लौटाता है, इसलिये भगवान / गुरु पर चढ़ता है।

Archived under वचनामृत – मुनि श्री क्षमासागर Comments off

धनतेरस

धनतेरस को जैन आगम में धन्य तेरस या ध्यान तेरस भी कहते हैं ।  भगवान महावीर इस दिन तीसरे और चौथे ध्यान में जाने के लिये योग निरोध के लिये चले गये थे। तीन दिन के ध्यान के बाद योग निरोध करते हुये दीपावली के दिन निर्वाण को प्राप्त हुये । तभी से यह दिन धन्य तेरस के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

मुनि श्री क्षमासागर जी/श्री रतनलाल बैनाडा जी

Archived under वचनामृत – मुनि श्री क्षमासागर Comments off

दिगम्बरत्व

मुसलमान समुदाय के अब्दुल कासिम गिलानी और समंद आदि औरंगजेब बादशाह के समय दो फ़कीर हुये जिन्होंने दिगम्बरत्व को अपनाया ।
बादशाह के पूछ्ने पर कि आप नग्न क्यों रहते हैं ?
उन्होंने जबाब दिया कि लिबास वो पहनते हैं जिनमें ऐब होते हैं और जिसने तुझे ये बादशाहत दी है उसी ने हमें ये लिबास दिया है, हम उसके दिये हुये लिबास को कैसे छोड़ दें ?

Archived under वचनामृत – मुनि श्री क्षमासागर Comments off

गुरू

दवा की शीशी पर पूरे Ingredients , बीमारी का नाम तथा लेने की विधि लिखी रहती है,
फिर  भी Under Direction Of Doctor लिखा जाता है ।

शास्त्रों में सबकुछ लिखा होने के बावजूद भी गुरू के Direction की आवश्यकता है ।

Archived under वचनामृत – मुनि श्री क्षमासागर Comments off

परिणाम/परिमाण

जीवन में दो चीजें सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण हैं ।

1. परिणाम
2. परिमाण

मुनि श्री क्षमासागर जी ( कर्म कैसे करें ? )

Archived under वचनामृत – मुनि श्री क्षमासागर Comments off