Posted by admin on September 4, 2010 at 12:43 am
श्री आतिफ़, आशीषमणी के मित्र Canada में कार्यरत हैं, मुझ से मिलने बस से आ रहे थे जबकि घर में गाड़ीयां थीं ।
पूछने पर बताया – जब मैं अकेला चलता हूं, तब कार का प्रयोग नहीं करता हूँ और उससे जो बचत होती है वो पैसा मैं दान में देता हूँ । क्योंकि वो पैसा मैने अपनी सुविधाओं को कम करके बचाया है, उस पर मेरे परिवार का अधिकार नहीं है ।
युवा आतिफ़ की ऐसी भावनाओं से हम भी कुछ सीखें ।
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Posted by admin on July 18, 2010 at 12:37 am
एक पंड़ित जी, मुझे लेकर साहू शांति प्रसाद जी से मिलने गये ।
साहू जी अधिकतर समय अपनी व्यस्तता का बखान करते रहे, कि मेरा एक पैर जमीन पर तो दूसरा आसमान (हवाई जहाज) में ही रहता है ।
पंड़ित जी ने बाहर निकल कर कहा – लगता है, इनके खराब दिन आने वाले हैं ।
6 माह बाद पंड़ित जी का पत्र आया कि साहू जी को लकवा मार गया है, मल मूत्र विसर्जन भी बिस्तर पर ही हो रहा है । उसी हालात में उनका निधन हो गया ।
श्री लालमणी भाई
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Posted by admin on June 14, 2010 at 12:24 am
करैया गांव में पंचकल्याणक हुआ । लालमणी भाई उस समय 10 वर्ष के थे और जलूस में हाथी पर बैठने की जिद करने लगे । हाथी पर बैठने के लिये 1000 रू. जमा कराया जा रहा था, जो उनकी दादी के पास नहीं थे फिर भी दादी ने 100 रू. दान दिये ।
पंचकल्याणक किसी वजह से रद्द हो गया और सबके पैसे वापिस कर दिये गये पर दादी ने 100 रू. वापिस नहीं लिये जबकि 1000 रू. वालों ने अपने पैसे वापिस ले लिये ।
दादी का कहना था कि आज मैं 1000 रू. दान नहीं कर पाई पर मुझे विश्वास है कि, ये 100, 100 रू. दान करते हुये जिस दिन 1000 रू. हो जायेंगे उस दिन मेरा नाती हाथी पर जरूर बैठेगा ।
जिन लोगों ने 1000 रू. वापिस ले लिये थे वे आज तक हाथी पर नहीं बैठ पाये और दादी का नाती बार-बार हाथी पर बैठा ।
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Posted by admin on May 23, 2010 at 12:17 am
सन् 1994 में गुरू श्री के प्रथम दर्शन करके गुना से लौट रहे थे । श्री जैसवाल ने अपने Managing Director श्री आई. महादेवन के बारे में बताया – “ये पक्के ईमानदार व्यक्ति हैं, इसलिये ऊपर से लेकर नीचे तक सब इनके Department वाले, इनके खिलाफ हैं और इनको बहुत तंग किया करते हैं । दूसरी बात यह है कि ये सुबह 2 घंटे भगवान की पूजा पाठ करते हैं”।
रास्ते में उनसे पूछा – आप रोजाना 2 घंटे धर्मध्यान करते हैं, उसके Return में आपको क्या मिला ?
श्री महादेवन ने ज़बाब दिया – “Material world में कुछ नहीं मिला, पर जब भी मेरे जीवन में दिक्कत आती है, तब मेरा यही धर्मध्यान मुझे सम्बल देता है, इसी के सहारे मैं सबको Face कर पा रहा हूँ” ।
श्री के. के. जैसवाल
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Posted by admin on May 22, 2010 at 12:00 am
श्रीमती शकुंतला जी की आर्यिका दीक्षा सोनागिर जी में 23 मई 2010 को संपन्न होनी थी । Programm पता करने के लिये, उनके पुत्र श्री पंकज को Phone किया । श्री पंकज के दो नं. मेरे Mobile की Memory में Save थे – पहला ‘Shop’ का, जिसके लिये पंकज के नाम के आगे ‘S’ लगाया गया था, दूसरा नं. ‘Mobile’ का था जिसे नाम के साथ ‘M’ लगाकर Save किया गया था ।
Dial करते समय आंखों पर चश्मा नहीं लगाया था, इस वजह से ‘Mobile’ की जगह ‘Shop’ वाला नं. Dial हो गया । गलती पता लगने पर दूसरा नं. Mobile वाला लगाया ।
मैंने पंकज से बोला -
दृष्टि सही नहीं हो तो, Dial करो ‘M’ For ‘मोक्ष’ – Call चली जाती है ‘S’ For ‘संसार’ को ।
Archived under संस्मरण – अन्य, चिंतन
Posted by admin on April 11, 2010 at 12:21 pm
श्री दुग्गल जी दिल्ली में बैंक केSenior Officer थे । उनको कैंसर हो गया था और Bombay इलाज़ के लिये आते थे । Hospital वालों ने विदेश से कोई ज़रूरी इंजेक्शन मंगाया और उसके लिये दुग्गल जी को दिल्ली से बुलवाया। जब वे Bombay पहुंचे तो वह इंजेक्शन Misplace हो गया । कई दिन इंतज़ार करते रहे और तबियत खराब होती गई तब उन्होंने Dr. P. N. Jain को फोन किया । Dr. Jain इस Mismanagement से बहुत दुःखी हुये । तब दुग्गल जी ने कहा – दुःखी ना हों, ये शेर सुनें -
“खुदा की हुकूमत में, हरसू अमल है, तफ़्कर में जान अपनी क्यों खोता ।
हुआ जो है अकबर, समझ तू ज़रूरी, गर ज़रूरी ना होता, तो हरगिज़ न होता ।”
(तफ़्कर = फ़्रिक )
शेर सुनाने के अगले दिन श्री दुग्गल जी का निधन हो गया ।
क्या ऐसी मुसीवतों में हम समता भाव रखते हैं ?
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Posted by admin on April 8, 2010 at 8:24 am
सिंगापुर में एक मित्र हमेशा एक नं. छोटा जूता पहनते थे ।
पूछने पर जबाब दिया – जब Office से घर आकर जूता उतारता हूँ, तो बहुत सुख और सुकून मिलता है ।
श्री तन्मय
संसारी सुख भी ऐसा ही है – थोड़े से सुख के लिये पूरी ज़िंदगी हम परेशानियां झेलते रहते हैं ।
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Posted by admin on March 18, 2010 at 7:21 pm
बारहवीं कक्षा में जब मेरा Dissection करने का नम्बर आता था, तो मैं Side वाले का देख कर काम चला लेता था ।
पर Exam में ड़र था कि मेंढ़क काटना ही पड़ेगा, सो भगवान से प्रार्थना करता रहता था कि मुझे Exam में मेंढ़क ना काटना पड़े।
सारे Colleges के Exams एक साथ होने से मेंढ़क कम पड़ गये और Examiner ने Offer दिया – जो Dissection नहीं करना चाहें वे सिर्फ Viva दे सकते हैं, मैने Viva ले लिया और मैं Dissection करने से बच गया ।
Dr. S.M. Jain
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Posted by admin on March 6, 2010 at 7:06 pm
आ. शांतिसागर जी महाराज को आहार देते समय अम्मा से कोई त्रुटि हो गई। प्रायश्चित पूछ्ने पर पंड़ित जी ने बताया तो उन्होंने किसी दुसरे महाराज के एटा आने पर भरी सभा में रोते हुये अपनी गलती स्वीकारी, सब लोगों ने Criticize भी किया, पर मुनि महाराज ने कहा कि तुम्हारा प्रायश्चित तो हो गया ।
पाप को 10 लोगों को बता दो तो वह कम हो जाता है, ऐसे ही पुण्य को 10 लोगों को बखान करो तो वह भी कम हो जाता है ।
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Posted by admin on January 30, 2010 at 5:38 pm
आयुष जैन (गुना ) 12 साल के बच्चे ने अपनी मां से आचार्य श्री के श्री मुख से सुना कि एक शराबी हर समय शराब पीता था, उसे कहा गया कि कमरे के एक कोने से दूसरे कोने में जाओ तब शराब ना पीने का नियम ले लो । उसने नियम ले लिया, कमरे में एक कोने से दूसरे कोने में जाते समय छत गिर गई और वो मर गया, लेकिन मृत्यु के बाद देव बना, क्योंकि वह त्यागी मरा था ।
आयुष को भी Thalassemia बीमारी हो गयी | जब हालत बहुत बिगड़ने लगी और उसे इन्दौर Ambulance से ले जाने लगे, रास्ते में उसे घबराहट हुई उसके पिता ने कुछ खाने और दवा लेने का आग्रह किया तब आयुष ने कहा कि मैं तो नियम लेके चला हूँ कि जब तक इन्दौर नहीं पहुंच जाऊंगा, तब तक मेरा अन्न, जल और दवा का त्याग है।
आज आयुष अपना नियम द्रढ़ता से निभाते हुये प्राण त्याग कर, देवलोक को सिधार गये हैं ।
छोटे-छोटे नियमों को द्रढ़ता से पालने वाले देवगति ही पाते हैं ।
मनीषा बुआ
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